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Monday, June 29, 2020

#१ # विश्वविद्यालय के दिन: अर्चना मिश्रा

#विश्वविद्यालय के दिन


 अर्चना मिश्रा 
ये उन दिनों की बात है यानि सन् 1990 की ,इसी वर्ष मैंने इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। परीक्षा समाप्त होने के साथ-साथ मन में ढेर सारे ख्वाब और उत्साह कि अब स्कूल से छुट्टी मिल जायेगी और हमारा अगला पड़ाव कालेज होगा ,कालेज जाने की खुशी इस बात से थी कि  हम अब बड़ी क्लास में प्रवेश ले रहे हैं और दूसरी सबसे बड़ी खुशी यह  थी कि यूनिफार्म से भी छुट्टी मिल जायेगी। थोड़ी जिज्ञासा फिल्मों के कालेज जीवन को देख कर भी थी कि क्या सच में कालेज का जीवन ऐसा ही होता है। मैं भी पूरे जोश, उत्साह, जिज्ञासा, और लगन के साथ कालेज जाने की प्रतीक्षा करने लगी।
 
आज कल, बच्चे स्वयं इंटरनेट पर सारी जानकारी इकट्ठी कर लेते हैं और उनकी इच्छा के अनुसार विषय वगैरह चुनने की हम उन्हें पूरी आजादी दे देते हैं। लेकिन हमारे समय में ऐसा नहीं था , रिजल्ट निकलने के बाद क‌ई लोगों की राय ली जाती थी कि किस कालेज में दाखिला दिलवाया जाए तथा कौन से विषय लिए जाएं , उसके बाद जो निष्कर्ष निकलता था लगभग उसी पर अमल किया जाता था । ठीक ऐसे ही इंटरमीडिएट परीक्षा का परिणाम घोषित होने के बाद विचार विमर्श शुरू हुआ और निष्कर्ष यह निकला कि मेरा दाखिला विश्व विद्यालय में करवाया जायेगा यदि लिस्ट में नाम नहीं निकला तब दूसरे विकल्प पर विचार किया जाएगा इसके पीछे एक तर्क यह मिला कि एक कपड़ा यदि गोलघर की किसी दुकान से खरीदा जाता है और दूसरा कपड़ा किसी छोटी दुकान से लिया जाता है तो दोनों में गोलघर वाली वस्तु का महत्व अधिक होगा क्योंकि यह स्टैंडर्ड का विषय है। खैर ...प्रवेश फार्म भरने के पश्चात् लिस्ट में नाम आ गया और मेरा दाखिला गोरखपुर विश्वविद्यालय में हो गया । स्नातक में हिंदी, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र विषय में प्रवेश के लिए मैंने आवेदन किया था लेकिन मुझे अर्थशास्त्र की जगह संस्कृत विषय मिला लेकिन मैंने दौड़ भाग करके पुनः अर्थशास्त्र विषय में अपना एडमिशन ले लिया। हालांकि परास्नातक( हिंदी) के उपरांत मैंने केवल संस्कृत विषय (एक विषय)लेकर पुनः स्नातक किया लेकिन उस समय दिमाग में पता नहीं क्या फितूर सवार था कि संस्कृत विषय मिलने के बाद भी मैंने उसे छोड़ दिया। 

खैर, बड़े उत्साह के साथ विश्वविद्यालय में जाना शुरू हुआ ,गुरुजन कक्षा में नियमित रूप से अध्यापन के लिए आते थे ये अलग बात थी कि कुछ शिष्याएं केवल पढ़ने विश्वविद्यालय नहीं आती थीं उन्हें और भी कई महत्वपूर्ण कार्य होते थे जो वह विश्वविद्यालय आने के बहाने उसे संपादित किया करती थीं,वह उनका व्यक्तिगत मामला था । हिंदी विभाग से डॉ के सी लाल, डॉ सुरेंद्र दुबे, डॉ अनिल राय, डॉ मंजू त्रिपाठी, डॉ राम दरश राय, डॉ गणेश पाण्डेय, डॉ जनार्दन, डॉ चितरंजन मिश्र, पूर्णिमा सत्यदेव  गुरुजनवृंद से ज्ञान प्राप्त करने का सौभाग्य मुझे मिला ।
      मनोविज्ञान विभाग में डॉ अचलनंदिनी श्रीवास्तव , डॉ सुषमा पांडेय, डॉ बब्बन मिश्र, अशोक सक्सेना, डॉ नरेन्द्र मणि, गुरूजन से शिक्षा प्राप्त हुई । अर्थशास्त्र में डा संदीप दीक्षित सर , डॉ योगेश सिंह ,यादव सर यामिनी जोशी मैम से शिक्षा ग्रहण करने का मुझे सौभाग्य मिला है । यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे जिन सम्मानित गुरुजी लोगों से शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला वह अपने विषय में अथाह ज्ञान के सागर थे जो  नियमित रूप से अध्यापन कार्य करने वाले और धाराप्रवाह रुप से अपने विषय में व्याख्यान देने वाले थे जिन्हें बस, केवल सुनते रहिए।
गोरखपुर विश्वविद्यालय का प्रवेशद्वार 

    हालांकि विश्वविद्यालय में जब मेरा एडमिशन हुआ तो अनुशासन का पूरी तरह से अभाव था l गुरुजन अपने पूरे जोश के साथ व्यख्यान दे रहे हों तो भी अचानक से भावी नेता बिना किसी हिचक के सीधे कक्ष में प्रवेश करके व्यवधान डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते थे । चुनाव के दौरान यह बहुत खटकता था क्योंकि पठन-पाठन का आधा भाग ,बारी -बारी आने वाले नेता जी नष्ट कर देते थे।हमारी कक्षाएं परीक्षा भवन में चलती थीं उसके बाहर अति उत्साही स्वघोषित भद्र पुरुष किसी की प्रतीक्षा में सदैव उपस्थित रहते थे । 

कुछ समय उपरांत प्रोफेसर विश्वंभर शरण पाठक महोदय ने विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में कार्यभार ग्रहण किया और  अनुशासन  का कठोरता से पालन करवाने की कोशिश शुरू की तत्पश्चात् विश्वविद्यालय के शैक्षिक वातावरण  में कुछ  सुधार हुआ । मैं यह नहीं बताऊंगी कि पाठक सर के पहले कुलपति के रूप में कौन विराजमान था या थीं।  

(क्रमशः)

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