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Sunday, June 28, 2020

#१ # विश्वविद्यालय के दिन: पद्माकर द्विवेदी

धागा मोह का

पद्माकर द्विवेदी 
इसके पहले वह कभी चंडीगढ़ नहीं गया था।
पर अब जा रहा था। दिल्ली में यूनिवर्सिटी के वो उसके आख़िरी साल थे। दिसंबर की सर्दियों में उसकी यूनिवर्सिटी के डिबेटिंग क्लब ने उसे पंजाब यूनिवर्सिटी में होने वाले नेशनल डिबेट चैंपियनशिप में यूनिवर्सिटी को रिप्रेजेंट करने के लिए चुना था। लड़के को तय करना था कि वह या तो हॉस्टल में रहकर महीने के आख़िर में पड़ने वाले अपने जेआरएफ के एक्ज़ाम की तैयारी करे या फिर वो अपना बैक -पैक तैयार करे और कुछ ज़रूरी किताबें लेकर चंडीगढ़ के लिए निकल पड़े। पर आदतन उसने दूसरा विकल्प चुनना ही मुनासिब समझा। लड़के ने उसी दिन डीन ऑफ स्टूडेंट्स वेलफेयर ऑफिस जाकर एडवांस लिए और 14095 अप 'हिमालयन क्वीन' की सेकेंड एसी की टिकट करा ली। होस्टल के पीसीओ बूथ पर एक रुपए का सिक्का डाला और घर पर बता दिया कि वो जा रहा है- चंडीगढ़। वैसे भी उसे सिर्फ बताना ही तो होता था हर चीज़। वो सुनता किसकी था?

दरअसल कॉलेज के दिनों से ही डिबेट लड़के का पैशन था। उसे बोलना पसंद था। बचपन से ही इंट्रोवर्ट रहे इस लड़के की यही एक चीज़ थी जो उसे औरों से जुड़ने में मदद करती थी। गोया अपने ज़िंदगी की बहुत सारी खाली छूट गई जगहों को वो ऐसे ही बोल-बोल कर भरना चाह रहा हो। पर वह अपने बोलने में औरों को भी सुनना जानता था। उसे मालूम था एक अच्छा लिसनर ही एक अच्छा स्पीकर हो सकता है। उसने कई डिबेट्स कीं थी अब तक जिसमें वह तीन चौथाई से ज़्यादा डिबेट्स जीतने में कामयाब रहा था और पैसे भी ठीक-ठाक जीते रहे होंगे। उसके तर्क अब तक कामयाब रहे थे। इस चैंपियनशिप को इस बार पंजाब यूनिवर्सिटी और मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन मिलकर स्पॉन्सर कर रहे थे। ज़ाहिर है इस बार प्राइज़ मनी भी जबर्दस्त थी। शायद लड़के ने इस वज़ह से भी दूसरा विकल्प चुना था। आख़िर 4 +1 कुल पाँच मिनट बोलकर अगर अच्छे ख़ासे पैसे भी मिल जाएं तो बुरा क्या था? और यूनिवर्सिटी की मुद्रा पर चंडीगढ़ शहर घूमने का लुत्फ़ अलग। मिडिल क्लास लड़के ऐसी ही कैलकुलेशन में जीते थे उन दिनों।
Punjab University 

उसे बचपन से ही स्पर्धाएं पसंद थीं। इन्हीं स्पर्धाओं ने ही उसे महत्वाकांक्षी बनना सिखाया था। वह अक्सर नेपोलियन को उद्धरित करता हुआ कहता था-"जो अकेले चलते हैं वो तेज़ी से आगे बढ़ते हैं।" बचपन से ही घर से बाहर बोर्डिंग और होस्टल की अकेले रहने वाली जिंदगी को जैसे वो इस एक लाइन से जस्टीफाई करता रहा हो। शाम को सारे काम पूरे करके हॉस्टल से 894 नम्बर की बस लेकर वह सीधा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचा। उसका दोस्त और रूममेट उसे पहुँचाने आया था। आम दिनों की ही तरह ही राजधानी के सबसे बड़े रेलवे स्टेशन पर वही शोर-शराबा। वही चहल-पहल। ट्रेन के अंदर आकर उसने अपनी सीट ली। दोस्त ने गले लगाया और जीतने की शुभकामनाएं दीं। लड़के ने इसके बदले पार्टी का वादा किया। दोस्त के जाने पर उसने कुछ देर तक गाँधी के हिन्द स्वराज्य व माल्थस और एडम स्मिथ की थ्योरीज़ पढ़ीं। क्या पता डिबेट में कुछ मदद मिल जाए। फिर कुछ देर बाद बत्ती बुझाई। किताब रखा और सो गया।

लड़का तीन साल से दिल्ली में यूनिवर्सिटी के अपने होस्टल में रह रहा था। यूपी के अपेक्षाकृत छोटे से शहर का वह लड़का जिसे दिल्ली ने इन सालों में बहुत कुछ बदला था। पर बहुत कुछ ऐसा भी था जिसे शायद अब भी नहीं बदला जा सका था। यही कुछ गढ़ा- अनगढ़ा ही मिलकर उसे बनाते थे। वह गम्भीर भी था और चंचल भी। विनम्र भी था उद्दंड भी। भावुक भी ज़िद्दी भी। वह एक साथ सबकुछ था। अच्छाई और बुराई का परफेक्ट कॉकटेल। प्रीवियस ईयर में वह टॉप कर चुका था। इस साल भी गोल्ड मेडल के सबसे नज़दीक था। उसके दोस्त ने आगाह भी किया कि भाई थोड़ा और मेहनत कर लो। मेरे जैसे फर्स्ट डिवीजनर बहुत होते हैं पर गोल्ड मेडलिस्ट एक ही होता है। थोड़ा कंसन्ट्रेट कर लोगे तो यह तमगा ज़िंदगी भर के लिए तुम्हारे साथ होगा। क़िस्मत अच्छी रही तो वाइस चांसलर मेडल भी तुमसे बहुत दूर नहीं है। और फिर तुम्हारे जेआरएफ एक्जाम सर पर हैं। क्या तुम्हें अब फैलोशिप की चाहत नहीं रही? लड़के ने दोस्त की चपत ली और समझाया - "मेरे यार तुम्हारी मोहब्बत सर आँखों पर।" लेकिन प्रीवियस ईयर में भी आख़िर मैंने यह सब करते हुए ही मार्क्स लाए हैं। अभी तो समेस्टर ख़त्म ही हुआ है। काफी वक़्त है फाइनल एक्ज़ाम के लिए। और फिर जिस वाइस चांसलर मेडल के लिए तुम मुझे सदाएं दे रहे हो उसके लिए ओवर ऑल परफॉर्मेंस ज़रूरी है। ऐसा समझो कि यह डिबेट भी इसी का हिस्सा है। और फैलोशिप तो इस बार मैं ले ही लूँगा।दरअसल लड़के में आत्मविश्वास बहुत था। यही उसकी अच्छाई भी थी और कमी भी। पूर्वांचल के लड़कों में ओवर कॉन्फिडेंस एक कॉमन इंग्रेडिएंट्स है। यह कोई नई चीज़ नहीं थी।

ख़ैर। ट्रेन रुकी तब तलक सुबह हो चुकी थी । लड़के ने आँखे खोलीं तो खिड़की से स्टेशन पर पीले पट्ट पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा देखा- चंडीगढ़! समुद्र तल से ऊँचाई 330 मीटर। वह पहली बार पंजाब की धरती पर आया था। उसने महसूस किया कि पंजाबी बहुत अच्छे होस्ट होते हैं। और खुश मिज़ाज भी।स्टेशन पर निकलते ही पंजाब यूनिवर्सिटी का स्वागत काउंटर था। पंजाबी परिधान में एक खूबसूरत लड़की ने रैप्ड पेपर में आधा रैप किया हुआ लाल गुलाब का फूल देकर उसका स्वागत किया। लड़का मुस्कुराया और अभिवादन का प्रत्युत्तर अभिवादन से दिया। सामने ही वॉल्वो खड़ी थी। देश के अलग-अलग यूनिवर्सिटी से काफी प्रतिभागी आ रहे थे। जो आ चुके थे उन्हें इसी बस में बैठकर यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस जाना था। लड़का भी इसी बस में जाकर बैठ गया। ज्योहीं ड्राइवर ने दलेर मेहंदी के पंजाबी गानों का बैस बढ़ाया सबके चेहरों पर खुशी उछल सी गई। बस में बैठे सारे लड़के -लड़कियां जो आज यहां हैं कल को न जाने कहाँ होंगे अपनी-अपनी जिंदग़ियों में। ऐसा लड़के ने सोचा। सबके अपने संघर्ष होंगे। सबकी अपनी दुश्वारियां होंगी। सबके अपने जद्दोजहद होंगे। वह महसूस कर पा रहा था कि वह अपनी ज़िंदगी के उस मिडवे से गुज़र रहा है जहां ये वक्त दुबारा नहीं आने वाला था। कोई यू टर्न नहीं था वहां। उसे रंग दे बसंती का वह संवाद याद आया जिसमें आमिर ख़ान का क़िरदार कहता है-" जब तक हम कैम्पस में होते हैं, हम दुनिया को नचाते हैं। एक बार कैम्पस से बाहर आ जाने पर वही दुनिया हमें नचाती है।"

कुछ ही देर बाद बस रुकी। और उसके ख़्याल भी। पंजाब यूनिवर्सिटी का शानदार कैम्पस। कैम्पस की सड़कें ऐसीं कि फेरारी दौड़ जाए। नवीन स्थापत्य से बनी यह वही यूनिवर्सिटी थी जहां प्राइमिनिस्टर मनमोहन सिंह स्टूडेंट रहे थे। जगजीत सिंह ने तरुणाई में यहां कितनी गजलें सुनाई होंगी अपने दोस्तों को। और फिर अनुपम खेर जो हिमाचल से अपने घर से पैसे चुराकर यहां आ गए थे एक्टिंग सीखने के लिए। परिसर नाम के ही मुताबिक ऊर्जा से भरा हुआ था। कैम्पस में ही चंडीगढ़ मेडिकल कॉलेज के सामने ही यूनिवर्सिटी का गेस्ट हाउस था। बस रुकी तो बस से उतरते ही पीछे से एक मद्धम सी आवाज़ आई। एक्सक्यूज़ मी.! लड़के ने मुड़कर देखा। एक पार्टिसिपेंट लड़की ने बहुत ही विनम्र स्वर में कहा - यह बुक शायद आपकी है। सीट पर रह गई थी। लड़के ने थोड़ा असहज होकर कहा। "ओ हाँ..। थैंक्स । मेरी ही बुक है। मैं अक़्सर अपनी चीजें भूल जाया करता हूँ। शुक्रिया आपका.!" बात -चीत में लड़का -लड़की बस से उतरकर थोड़ी दूर आ गए। ठंड बहुत थी सो लड़के ने जल्द ही विदा ली और शुक्रिया कहकर आगे बढ़ गया।

लड़के ने गेस्ट हाउस के काउंटर पर अपने नाम के आगे साइन किया। चाभी ली और कमरे पर जाकर एक बार फिर से सो गया। सोना जैसे होस्टल में रहने वालों का राष्ट्रीय शगल हो। हाउस कीपिंग असिस्टेंट ने दरवाज़े और फर्श के बीच नीचे से उसके कमरे में अख़बार सरका दिए थे। उसे ब्रेक फास्ट के लिए कॉल दी गई फिर भी वह सोया ही रहा। दोपहर तक सोता ही रहा वो। फिर लंच के ठीक पहले जागा। आँखे मीचकर उसने खिड़की से पर्दा सरकाया तो उसे वही लड़की दिखाई दी जिससे सुबह उसकी मुलाकात हुई थी और बातचीत में तीन बार उसने उसे शुक्रिया कह डाला था।

Guest House
वह मन ही मन मुस्कुराया। दिन बहुत ख़ुशगवार था आज। धूप निकल चुकी थी। मौसम में सर्दी कम हो चली थी। बाहर कैंपस में खिले हुए फूल एक अलग ही छटा का निर्माण कर रहे थे। बालकनी से आकर उसने कॉफी का मग टेबल पर रखा और डायरी के कुछ पन्ने भरे। अब उसे इंतज़ार था तो उस मौके के लिए जिसके लिए वह यहां तक आया था। पर उसे क्या मालूम था कि आगे उसे एक साथ दो-दो स्पर्धाओं में होना है। जीवन में ऐसे ही बहुत कुछ होता है। एकदम अचानक और अप्रत्याशित..! बिना किसी आहट और पूर्व सूचना के। बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के। वह आने वाले पलों से बेख़बर था।

लड़के को प्रेम में होना था...!

(#क्रमशः)


पद्माकर द्विवेदी 
सम्प्रति, भारतीय रिज़र्व बैंक की क्लास-I सर्विसेज के अंतर्गत 
मुंबई स्थित केंद्रीय कार्यालय में अधिकारी (बैंकिंग विनियमन) 
के रूप में पदस्थ हैं ।

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