नवोत्पल में आपका स्वागत है...!

Wednesday, April 3, 2019

आम औ गाँव- आलोक रंजन

अलग अलग तरह के आम एक ही समय में अलग अलग किस्सों की ओर ले जा रहे हैं । कच्चे आमों के किस्सों से लेकर पके #आमों_की_रसीली_दास्ताँ सब एकसाथ खुल रही हैं ।

छवि: आलोक रंजन 


अभी गर्मी उतनी ही है जितनी आधे मई के आसपास अपने उत्तर में होती है । यहाँ केरल में बिना चप्पल के तो नहीं चला कभी लेकिन बचपन में एक हवाई चप्पल के टूटने और दूसरे चप्पल के आने तक की दुनिया में बिना चप्पल के रहने का सुख भी था और उसके दुख भी ! धूप में तप रही जमीन पर पैर नहीं पड़ पाते थे । एक कदम रखा कि शरीर अपना सारा भार दूसरे पैर पर डालने को विवश हो जाता ! मेरे लिए चप्पल की दिक्कत एक दो दिन से लेकर हफ्ते भर तक की ही रहती थी लेकिन मैं जहां रहता था (बिहार ) वहाँ के सौ दो सौ लोग ठीक उसी समय और ठीक उतनी ही धूप में खाली पैर कोई न कोई काम कर रहे होते । उन धूप भरे दिनों में आम की भुजनी / भुजबी / भुजिया का दौर चलता था ।

हम बच्चों के लिए यह बड़ा ही अलग था । ‘मॉर्निंग इस्कूल’ से भागकर या छुट्टी के बाद सीधे गाछी । हमारे पास बड़ों की दाढ़ी बनाने वाली ब्लेड रहती थी । वे ब्लेडें ऐसी जिनसे कई बार दाढ़ी बनायी जा चुकी होती और उनकी ‘धार मर’ चुकी होती थी । हम वे फेंकी हुई ब्लेड और कागज की पुड़िया में नून-बुकनी (नमक – मिर्च का पावडर) लेकर चलते थे । जहाँ कहीं कोई ‘टिकला’ (टिकोला /टिकोरा) मिला कि ब्लेड से छील कर नून बुकनी के साथ चट कर जाते । वैसे यह आदर्श स्थिति थी । बहुत बार ब्लेड साथ नहीं होते तो कई बार केवल नून मिल पाता । इसके पीछे पूरा अर्थशास्त्र काम करता था । नमक की तुलना में मिर्च काफी महँगी होती है सो बुकनी न तो अपने घर से न ही किसी और के घर से आसानी से मिल पाती थी । ऊपर से टिकला खाना सबसे गैर जरूरी काम माना जाता था । उसके लिए डांट पड़ती थी और मार भी । लेकिन वह बच्चा ही क्या जो डांट और मार के डर से टिकला खाना छोड़ दे ! हम धूप में टिकले बटोरते और कहीं बैठ के खाते । कभी कभी बिना नमक मिर्च के भी खा जाते थे । आज शायद ही यह सब हो पाये ! लेकिन सबसे ज्यादा मज़ा उन दिनों में आता था जब दोपहरें गंभीर होने लगती थी , टिकले थोड़े बड़े हो जाते थे । उन दोपहरों में माँ- मौसियों और थोड़ा बाद में मामियों की दुनिया खुलती थी ।

मेरी माँ लंबे समय तक अपने नैहर में रही थी सो मैं भी वहाँ रहता था । पिताजी उन दिनों अपने कॉलेज में ही रहा करते थे और हर आठवें दिन पड़ने वाली ‘अष्टमी’ या ‘परीब’ की छुट्टी पर अपनी ससुराल ही आ जाया करते थे । बहरहाल वे गंभीर दोपहरें ! उन दिनों को बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए हैं बस आज से बीस – पच्चीस साल पहले की बात है बस ! मानव इतिहास में इतने साल बहुत मायने नहीं रखते लेकिन जिस तेज़ी से इन सालों में बदलाव आए हैं उसके हिसाब से लगता है कि वे दिन सौ साल पहले रहे होंगे । या नहीं तो कोई और दुनिया रही होगी जब सबके यहाँ टीवी नहीं आया था और पुरुषों का शाम को एक साथ बैठकर रेडियो सुनना जरूरी काम हुआ करता था । ठीक उन्हीं दिनों की दोपहर में कुछ दोपहरें ऐसी होती थी जो आम की खटास से ‘दाँत कोट’ (दाँत खट्टे) कर जाती ।


मौसियाँ या फिर हम बच्चे आम लाते फिर उन्हें छीलकर कद्दूकस किया जाता । कद्दूकस किए हुए आमों में नमक , बुकनी और फिर सब्जी में पड़ने वाला भुना हुआ मसाला मिलाया जाता फिर बनती ‘भुजबी’ या भुजनी । आज वह चटपटा स्वाद सोचकर ही मुँह में पानी आ रहा है । भुजबी में मिर्च ज्यादा डाली जाती थी सफ़ेद आम के लच्छों पर लाल लाल बुकनी का साम्राज्य ! मिर्च के तीखेपन से मुँह जलता रहता , सु सु की आवाज़ निकलती रहती , आँख से आँसू बहते रहते लेकिन उस चटपटे स्वाद में थोड़ा ज्यादा पा लेने के लिए धींगामुस्ती , मान-मनौव्वल , प्यार –दुलार और बेईमानी जारी रहती । भुजबी का ज्यादा बनना जरूरी था क्योंकि बहुत से लोग थे । हालाँकि पुरुष नहीं खाते थे बल्कि वे डांट ही लगा दिया करते थे । असल में एक बड़े घर में नाना के चार भाई अपने अपने परिवारों के साथ रहते थे । खाना चारों परिवारों का अलग बनता था और उस घर में सबके अपने अपने हिस्से के कमरे भी थे लेकिन रात हो या दिन जबतक कोई अनबन न चल रही हो तबतक लगता ही नहीं था कि कौन किस घर का हिस्सा है । आसपास के परिवारों का भी यही हाल था । और सबका आपस में मेलज़ोल अनबन से पहले तक बहुत घनिष्ठ रहता था । अनबन के बाद भी फिर से जुड़ जाना बड़ा सहज था । कोई भी अनबन लंबे समय तक चलते नहीं देखा मैंने । तो बात हो रही थी भुजबी की ! ज्यादा लोगों के लिए ज्यादा आम चाहिए थे सो रोज ऐसा आनंद नहीं मिल पाता था । लेकिन जब यह कर्मकांड होता था आनंद का अलग ही स्तर चलता था । बाद के वर्षों में मामियों के आने से उनके यहाँ के स्वाद आए । कोई दही डालने की हिमायती तो कोई दूध के ऊपर की मलाई ! असल मकसद स्वाद का चरम पा जाने का रहता था !

उन्हीं दिनों मुझे कई बार लगा कि स्वाद की विविधता के निर्माण और उसके हस्तांतरण में स्त्रियों की ही भूमिका होती है !




(सुप्रसिद्ध युवा रचनाकार, प्रसिद्ध यात्रावृतांत 'सियाहत' के लेखक)

सभ्यता की कलावीथिका- सत्यम् सम्राट आचार्य

'सौन्दर्य' शब्द अपने आप में नवीनता का आभास कराता है और इसके विलोमज के रूप में प्राचीनता प्रतिनिधित्व करती है 'प्रौढ़ता' का.  लेकिन यहां अजंता की वीथियों में टहलते हुए यदि आपको शैलाश्रयों की भित्तियों पर बुद्ध की औदार्य मुद्राओं और अप्सराओं की भावांगिमाओं के चित्र दिखाई दें तो प्राचीनता के इस चिरंतन सौन्दर्य की तुलना आप आधुनिकता के सर्वोच्च कला प्रारूपों से कर सकते हैं.

अजंता के कला साधकों की सौन्दर्योपासना का यह प्रतिफल संसार की किसी भी महनीय कलाकृति से तुलना किए जाने योग्य है. यथार्थ में कला की 'तपस्या'अजंता के पाषाण खण्डों पर ही परिलक्षित होती है इसके अन्यत्र बाकी सारे चित्रांकन 'सौन्दर्य के प्रलाप' भर है.







सभ्यता के उस ऊषाकाल में हमारी संस्कृति जागृति की उस अवस्था में थी जहाँ तक पहुंचने के लिए युरोप को पुनर्जागरण की लम्बी प्रतिक्षा करनी पड़ी. पूरब को बर्बर जातियों का आश्रय समझने वाले युरोप के सारे औपनिवेशिक सिद्धांत ,अजंता और इसके समवर्ती अलोरा की खोज के बाद महत्वहीन साब़ित हो गये हैं.

गुफा नम्बर 10 के एक भित्तिचित्र पर ब्रिटिश अधिकारी 'जॉन स्मिथ' ने जब 1819 की तिथि सहित अपने हस्ताक्षर खुरचे ,बस तभी पूरब के सौन्दर्य ने पश्चिम का मोहभंग कर दिया था और उसके बाद "युरोपिय सौन्दर्य के सारे कला प्रतिमानों ने आत्मसमर्पण कर दिया अजंता के द्वारमण्डपों के नीचे" । 

ये मेरा दूसरा दौरा था अजंता और अलोरा के लिए.
इन्दौर के 'स्मार्ट' वातावरण में मुझे एेसी कोई देवांगना नहीं मिली जो इन चित्रों का प्रारूप बनने के लिए तैयार हों. सो मैं ईसापूर्व पांचवी शति में बनी अजंता की वीथियों में इन अप्सराओं से अनुरोध करने चला आया.







पं नेहरू की हिन्दुस्तान की कहानी में पढ़ा था ''अजंता एक स्वप्नमय विश्व है''. 
मैं इसे सभ्यता की कलावीथिका कहूंगा... समय का एक एेसा स्वर्णिम गलियारा जहां से हम टहलते हुए इस दौर में पहुंचे हैं.

यहां धर्म ने अपने 'अनुभवातीत स्वर्गीय साध्य' तक पहुंचने के लिए 'अनुभवजन्य कला' के आलंकारिक सौन्दर्य को एक 'साधन' मान लिया है. बिल्कुल खजुराहो की भांति जहां गर्भगृहों के अन्दर प्रतिष्ठित 'धर्म के सनातन सत्य' की व्याख्या कर रहे हैं देवगृह के परिक्रमापथ पर उत्कीर्णित 'कामशास्त्र के कला प्रादर्श'. कुछ वैसे ही यहाँ अजंता की वीथियों में पाषाण भित्तियों पर उकेरा गया देवांगनाओं का आलंकारिक सौन्दर्य, अनुसरण कर रहा है चैत्यगृहों में अवस्थित अमिताभ की ध्यानस्थ शिल्पाकृतियों से.

सौन्दर्य की यह चित्रात्मक अभिव्यक्ति इतनी चैतन्य है मानो आज भी चैत्यगृहों के स्तूपों में दबी बुद्ध की अस्थियों को पुनः सिद्धार्थ बनकर कपिलवस्तु जाने के लिए उकसा रही हो. हमने कथाएँ पढ़ी हैं लोकरंजक आख्यानों में, दंतकथाओं से उन्हेें सुना है, लेकिन 'सभ्यता का कथात्मक इतिवृत' एक धारावाहिक के रूप में आज भी अजंता के पत्थरों पर उकेरा हुआ है.

ये सौन्दर्य की अनुपमेय कृतियां उन्हीं जातक कथाओं की नायिकाएं हैं जो आज 2000 वर्ष बाद भी पाषाणों के रंगमंच पर अपने पात्रों को अभिनीत कर रहीं है. लेकिन इस रंगमंच के नैपथ्य में अजंता के शिल्पकारों और सर्जक कलाकारों के हाथ निश्चित ही सृष्टिकर्ता के हाथों की प्रतिकृति रहे होंगे जिन्होंने हमारी सभ्यता के इस विशाल 'एकाश्मक कैनवास' पर हमारी संस्कृति की व्याख्या को कला के अद्वितीय प्रादर्श के रूप में उपनिबद्ध किया.

मैं अजंता के इस स्वप्नलोक में तब तक जाता रहूंगा जब तक कि मुझे उन लोगों के पद्चिन्ह नहीं मिल जाते जिन्होने इसे रचा है. कालचक्र की परिधि को लांघने का यदि मुझे सुअवसर मिले तो मैं जाना चाहूंगा उस दौर में जहां वाघुर नदी के चन्द्रपरास पर अजंता के शिल्पियों की पत्नियां उनके लिए पानी भर रहीं हों, बोधिसत्व पद्मपाणी के रेखाचित्र की उपकल्पना करने वाले चित्रकार के मुख की गंभीरता को मैं देखना चाहूंगा, राहुल और यशोधरा के सामने भिक्षा मांगते बुद्ध का चित्र खींचने वाली तूलिका का सामर्थ्य देखना चाहूंगा, पूछना चाहूंगा उन शिल्पकारों से कि अवलोकितेश्वर का ध्यानस्थ मुख बनाते समय उन्होंने अपने दृढ़ औजारों को उदारता और कृपणता कैसे सिखलाई होगी, बोधिसत्वों की मुख मुद्राएँ उकेरते समय उन्होने कौन सा दर्शन पढ़ा होगा...!

फिलहाल मैं अपनी कालयात्रा यहीं स्थगित करता हूं, यदि आप इस स्वप्नलोक का भ्रमण करने के इच्छुक हैं तो अपने या अपने जैसे किसी के साथ औरंगाबाद की बस पकड़ लीजिए। 





गाँव की ज़मीन-अंजनी कुमार पांडेय

पहले मेरे गाँव मे लोगों के घर छोटे हुआ करते थे । घर के आमने-सामने, अग़ल- बग़ल खुली ज़मीन ख़ूब हुआ करती थी ।  मुझे याद है मेरा खुद का घर छोटा सा था । तीन चार कमरे हुआ करते थे । मिटटी की दीवार हुआ करती थी , लकड़ी के दरवाज़े साँकल वाले और खपरैल की छत । घर के सामने दो तीन छान्ह हुआ करती थी जिसमें एक चारपाई हमेशा पड़ी रहती थी । जानवर भी इन्ही छान्ह के बीच मे कहीं बाँध दिये जाते थे । घर के सामने का द्वार हमेशा बड़ा होता था । उसके सामने ख़ूब जगह होती थी । गाँव के लोग इन जगहों पर घंटों बैठकर ठहाके लगाते थे । कुल मिलाकर घर छोटे और लोग ज़्यादा हुआ करते थे । प्यार भी ख़ूब था । रोज़ की दिनचर्या मे भी पड़ोसी और रिश्तेदारों का सहयोग भरपूर मिलता था ।



खेती ही गाँव की जान हुआ करती थी और जितने ज़्यादा खेत उतना बड़ा नाम । इसलिये खेत ख़ूब होते थे ।बाग़ीचों की भरमार हुआ करती थी । मुझे याद है आम,जामुन ,महुआ और कटहल के ख़ूब सारे बाग़ीचे थे मेरे घर के अग़ल बग़ल । लेकिन आज जब जाता हूँ तो पहले की तुलना मे बाग़ बाग़ीचे कम हो गये हैं । कुछ पेड़ तो अपनी उम्र के साथ ख़त्म हो गये और कुछ को मेरे ही गाँव के लालची लोगों ने काट डाला। । कुछ घर हैं मेरे गाँव मे जो घोर लालची हैं । जब से मै देख रहा हूँ वह केवल गाँव का और गाँव की ज़मीन का नुक़सान कर रहे हैं । पद मे तो वह मेरे बाबा काका लगते हैं लेकिन एक नंबर के लालची हैं । हर समय घर के आसपास ग्राम समाज की ज़मीन क़ब्ज़ा करने मे लगे रहते हैं । धीरे धीरे गाँव के खुले रास्ते संकरे हो गये इन्ही लालची लोगों के चलते । रोज़ कहीं ना कहीं मेड़बंदी करते रहते हैं । हद्द तो तब हुई जब देखते देखते गाँव के खेत और बगीचों के बीच मे ही घर बना लिये इन लोगों ने ।

 पूर्वी उत्तर प्रदेश के सभी गाँवों का लगभग यही हाल है । गाँव सभी अच्छे थे लेकिन हर गाँव मे एक दो लालची गाँववालों ने गाँव की सारी खाली जगह और ग्राम समाज की ज़मीनों पर क़ब्ज़ा कर लिया है । देखते ही देखते गाँव के बाग़ीचे छोटी छोटी मेड़ वाली जोतों मे बदल गये । कच्चे कच्चे घरों के सामने फैली ख़ाली जगहों पर लोगों ने बड़ी बड़ी ईंट की दीवारें बना लीं और ज़मीन खा गये । दीवार खड़ी होते ही आपसी सहयोग की भावना भी ख़त्म सी हो गई है । 

पहले घर छोटे थे और खेत बड़े , अब घर बड़े हो गये और खेत छोटे ।
लेकिन गांव वाले यह भूल गये हैं कि जब खेत छोटे हो जायेंगे तो गाँव वाले कभी भी बड़े नही हो सकते।


अंजनी कुमार पांडेय 


पुराछात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय 

लेखक भारतीय राजस्व सेवा २०१० बैच के अधिकारी हैं और वर्तमान मे प्रतिनियुक्ति पर विदेश मंत्रालय मे रीजनल पासपोर्ट ऑफिसर के पद पर सूरत मे तैनात हैं ।