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Friday, September 1, 2017

आना-पाई दमड़ी-वमड़ी तक सब वसूल है- 'बरेली की बर्फी' : हेमा दीक्षित

हेमा दीक्षित
क्या आपने 'बरेली की बर्फी' खाई है ... नहीं अब तक नहीं तो जाईये जल्दी से खा लीजिये नहीं तो सच मानिये जिनगी बेकार है ... बहुत दिनों बाद हँस-हँस कर दोहरे हो जाने वाली कोई फिल्म आई है ...
यह एक ऐसी फिल्म है जिसका जबर ताली पीट हास्यबोध के साथ आनंद उठाया जा सकेगा ...
बिना किसी विदेशी लोकेशन, भारी-भरकम कास्ट, बेफालतू की तोड़-मरोड़ एवं उछल-फांद वाले बकवास नृत्यों, महावाहियात कपड़ो और गानों के, एक सामान्य मध्यमवर्गीय अभी भी कलई पुती और काली काई मिश्रित दीवारों, ताखों, कंगूरों, झरोखों, और चबूतरों पर बैठे लोगों वाले मोहल्ले के बेहद विश्वसनीय परिदृश्य, किरदारों, संवादों, दृश्यों, पहनावे और मिश्रा परिवार की कहानी के साथ ... जिसके उत्सवों और काम-काजों में आज भी अपने देसी गेंदे के फूलों की लड़ियाँ और बिजली के लट्टुओं की जगर-मगर ही एक घर के खिलखिला उठने के लिए बहुत है ... जहाँ गुंडे टाइप प्रेमी नायकों से इतर सामान्य वास्तविक लड़के है ... जो लड़की का हाथ पकड़ कर जबरिया येन-केन-प्रकारेण उसे अपनी होने को विवश नहीं करते ... जो अपनी प्रेमिका बिट्टी के सिगरेट और शराब पीने को ठीक वैसे ही स्वीकार करता है जैसे कि स्वयं अपने सिगरेट और शराब पीने की इच्छा को ... जहाँ आकर्षण, आपसी समझ और उसके साथ भी जो संकोच के एक बेहद प्रबल भाव का चित्रण हैं न वो बरबस आपको उस जोड़े को अपना मानने को विवश कर देता है ...



राजकुमार राव और उनका न भुलाने वाला प्रीतम विद्रोही नामक जीव का जबरदस्त अभिनय ...
साड़ी पहनाते-पहनते सेल्समैन के दब्बू लड़के और अपने दोस्त की बात को न, न ही कर पाने वाले रोल में प्राण तो भरे ही है पर वो जो टशन वाले चौड़े-वौड़े वाले विद्रोही भाई है न पूरी की पूरी महफ़िल तो वही उड़ा कर ले गए है ...
वो जो उनका टेम्पो, ट्रेक्टर ट्रैफिक रोक जाम करो ... दस रूपये के पान खाने और वापस लौट कर मोटर साइकिल पर बैठने वाला दृश्य है वो तो बस टशन का झंडा बुलंद नाद है ...


आयुष्मान खुराना तो अभिनय में निरंतर और-और आयुष्मान होते ही जा रहे हैं ... ऐसा लगा कि चिराग दुबे होने के लिए ही उनका जनम अभिनय की दुनियाँ में हुआ था ...


अपने माहौल में एक मिसफिट मध्यमवर्गीय लड़की बिट्टी के रूप में बिट्टी मिश्रा (कृति सेनन) का अभिनय और सौन्दर्य दोनों लाजव़ाब है ...


मिसिर जी और मिसराइन (पिता-माँ पंकज त्रिपाठी और सीमा पाहवा)ने अपने पात्रों का पहनावा, बोली-बानी और चरित्र बिल्कुल फिटम-फिट जूते के माफिक पहने हैं ... कहीं भी कोई ढीलापन नहीं है ... खासतौर पर मिसिर जी की पंखे से एकालाप की मासूमियत और मिसराइन के खर्राटों ने मेरा मन मोह लिया ...
पिता के रूप में अपनी बेटी बिट्टी से भावुकता की हद तक लाड भरा पिता उसके होने के स्वीकार्य में इतना उदार है कि जानता है कि उसकी दुलारी बिट्टी सिगरेट का शौक रखती है तो अपनी कब्ज की सुबह-सवेरे की मरोड़ का इलाज उसी बिट्टी से माँगने और पड़ोस के चाचा से मँगवा लेने में जरा उज्र नहीं रखता ...
इसी दृश्य में एक मोहल्ले के चाचा के द्वारा अल्ल सवेरे पी जा रही एक मुँह-दर-मुँह जूठी सिगरेट न केवल बिटिया के साथ संबंध के आधुनिक विस्तार वरन इसी बहाने एक साझा संस्कृति और उसके हकों का एक पाठ भी व्याख्यायित करती है ...


बस छपने भर को छप जाए पर एक भी किताब न बिके ऐसे अनबिके साहित्य के हश्र का फटे पन्नों पर पकौड़ी-समोसे वाला दृश्य बहुतए कातिलाना है ...


अश्विनी अय्यर तिवारी ने मेरे समझे में स्वस्थ हास्य और आस-पास मौजूद हमारे-आपके जैसे सामान्य जीवन की एक कामयाब फिल्म बनाई है ...और कॉमेडी के महाराजाधिराज बने बैठे उन तमाम हद दर्जे के फूहड़ मठाधीशों को उनकी जगह दिखाई है जो यह समझते हैं कि बिना गालियों और द्विअर्थी पंचलाइनों एवं उनके बीमार दिमागों से उपजे बेहूदा विरूपित स्त्री पात्रों के हास्य हो ही नहीं सकता ...

फुल्टू पैसा वसूल है आना-पाई दमड़ी-वमड़ी तक सब वसूल है ...

और हाँ पार्श्व में अपने भरे-पूरे उतार-चढ़ाव और चुटीलेपन के साथ मौजूद ज़ावेद अख्तर की आवाज़ इस खूबसूरत फिल्म में एक अतिरिक्त बोनस है ...

जिंदगी का एक गस्सा खाने के लिए जाना तो बनता है न 'मितरों' ...

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