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Thursday, September 21, 2017

#45 # साप्ताहिक विशिष्ट चयन: "एक झूठ बनाम हैप्पी एंडिंग" /रश्मि भारद्वाज


रश्मि भारद्वाज
भाषा भाव का दामन पकड़ हिलोर ले सरस सलिला रहती है. उसके अनायास प्रवाह को  समक्ष के असमतल उच्चावच रोक नहीं पाते. एक समय था जब हिंदी साहित्य में यथार्थपरक लेखन की परम्परा ने जोर पकड़ा और नयी कहानी, नयी कविता का जन्म हुआ. आन्दोलन ने अपनी छाप छोड़ी और हिंदी साहित्य की यात्रा में एक उम्दा मील का पत्थर बनी. वैश्वीकरण और उदारीकरण का भारत जहाँ दुनिया के फ़्लैट होने की बात कही जाती हो, हिंदी में समयोचित बदलाव अपेक्षित ही हैं. 

एक रुचिकर विडंबना यह भी है कि जिन पुरोधाओं ने कभी पारम्परिक धारा को चुनौती देने की कोशिश की थी और समयोचित परिवर्तन की महक से साहित्य को गुलज़ार किया था उन परम्परा में से ही दीक्षित कई अब इस नए समय के मुताबिक अपेक्षित परिवर्तनों पर कुंडली मारे बैठे हुए हैं. पर भाषा वह हवा है जो हौले से दरिया पार कर लेती है, दरख्तों पर झूलती है और पहाड़ों से गलबहियां करते हुए सौरभ बन जाती है. आज 'नयी हिंदी' की चर्चा अकारण नहीं है. 'नयी हिंदी' इस पीढ़ी की आवाज है, नयी हिंदी हवा का वह झोंका है जिसका आना रोका नहीं जा सकेगा, यह कभी परिवर्तन के पैरोकार रहे मूर्धन्यों का जवाब है, यह परम्परा और आधुनिकता के सिंथेसिस के कमाल से पैदा होती नयी धुन है. इस सिम्फोनी में यों तो कई नाम है, पर आदरणीया रश्मि भारद्वाज एक सशक्त हस्ताक्षर हैं. आपकी कृति 'एक अतिरिक्त अ' को 'ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. 

४५वीं साप्ताहिक प्रविष्टि नवोत्पल की विशिष्ट प्रविष्टि है. रश्मि भारद्वाज जी ने अँग्रेजी साहित्य से एम.फिल और पत्रकारिता में डिप्लोमा  की  उपाधि प्राप्त की है। आप को जागरण, आज आदि प्रमुख समाचार पत्रों में रिपोर्टर और सब - एडिटर के तौर पर कार्य का चार वर्षों का अनुभव भी है। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य तथा  गलगोटिया यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

आप कि कविता पर टीप कर रही हैं  कवयित्री राजलक्ष्मी शर्मा जी ने , जो कि अपने अनुवाद कार्य के लिए भी बहुत प्रसिद्ध हैं।  

(टीम नवोत्पल)


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एक झूठ बनाम हैप्पी एंडिंग

बचपन में हमें ठगने के लिए सुनाई जाने वाली कहानी में
हुआ करते थे एक राजा-रानी भी
दोनों मिले लो ख़त्म हुई कहानी
इन काल्पनिक कहानियों के नकली राजा-रानी
अब अक्सर राह चलते टकराते हैं
रानी के पैरों की फटी है बिवाई
राजा के जूते घिसे हुए हैं
खाली कनस्तरों सा अक्सर ढनमनाता है उनका प्रेम
दीवारों की झरती परतों से गिरते हैं सपने

हम मिलने को अक्सर मरने से बदलकर खिलखिलाते थे
आज़ अख़बारों के लाल पन्ने देख सहम जाते हैं
नींद के मीठे देश में ले जाने वाली वो कहानियाँ
आज़ नींदें ही ले गईं है अपने साथ
तब सो पाते थे बेफ़िक्र हम
जब तक नहीं था पता
कि राजा रानी के मिलने के बाद कहानी ख़त्म नहीं
बल्कि शुरू ही हुआ करती है
बीच के कई गुम पन्नें बाद में हमें मिलते
नजरें छुपाते हैं
उनका अंत लिखता कथाकार
ठीक अंतिम पंक्ति से पहले ही भूल गया है अपनी कहानी
यह सब हमने बहुत बाद में जाना

हम तो कहानी में जीते-जागते –सोते हैं
जब तक नहीं जानते
कि दरअसल कहानियाँ हमें जी रहीं होती हैं।


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साहित्य समाज के लिये परम आवश्यक है इसकी कई विधा अलग अलग रूप में अपना अस्तित्व बनाये हुए है गद्य  में निबंध  वृतांत , उपन्यास  ,कहानी लघु कथा समिलित हैं वही पद्य में दोहा, सोरठा कवितायें है ।

ये दौर अकविता का है  कम शब्दों में मन का/व्यवस्था का  प्रकटीकरण  ही कविता के रूप में हमारे सामने आता है सामयिकता का बोल बाला कविता लेखन में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है ।

वर्तमान में जब ढेर सारे साहसी कवि-कवियत्री तर्कपूर्ण ढंग से नये आयामों प्रतिबिम्बो के सहारे अपनी बात रखते है तब नवोत्पल की चयनित कवियत्री रश्मि जी अतीत की एक लोक कथा का चुनाव करती हैं ।  रश्मि एक चली आ रही बात पर रोशनी डालती हैं जो कमोबेश सबने सुनी होगी ,सुनते समय कल्पना की होगी और एक अवस्था के बाद सत्यता भी महसूस  की होगी बस कहने का साहस नही कर पाये |

रश्मि सहज शब्दों में वर्तमान जीवन शैली की वास्तविकता  साहसिक ढंग से उधेड़ती है । गीत वही है एक था राजा एक थी रानी दोनों मिल गये हुई कहानी ।
यहां रानी के पैरों की फटी बिवाई उसके अतीत के संघर्ष की दास्तान है जो सिर्फ आने वाले समय की उम्मीदी में दर्द बिसारते बीतता है ।  उनकी कविता में उपमाएं प्रतिमान क़तई गढ़े हुए नहीं लगती , बनावटीपन से कोसों दूर वो लिखती हैं ।
ख़ाली कनस्तरों सा बजता प्रेम तो ये सिर्फ परिस्थितियों को ढंकने की कोशिश मात्र है जो इन दिनों  का हिस्सा हो गया है
राजा रानी शायद दोनों ही सुनाने वाले की बुझी आंखों को याद करते हैं  जिन्होंने हमेशा कहा कि एक दिन एक राजा/रानी मिलेगा तुम्हे दूर कल्पना के देश ले कर जायेगा जहां तुम्हारी कल्पित सारी चीजें मौजूद रहेंगी ।

हक़ीक़त इसके विपरीत होती है रोज़ मरते मरते एक दिन हम परिस्थिति के आगे नतमस्तक हो जाते हैं खुद को अभ्यस्त पाते हैं इस जीवन शैली के जिसमे मुड़ने या रुकने की कोई गुंजाइश नही बचती इस तरह का जीवन जीना  जुबान को तल्ख और कलम को बागी बना जाता है ।

इस गीत  के रचनाकार को झिंझोड़ सकने की ताब परिस्थितियों में तप कर आती है ।
कवियत्री की बेचैनी पाठक की छाती तक उतरती है और यही बेलागपन और खड़े होने की मजबूती  ,प्रकटीकरण की यही साहसिकता उंन्हे भीड़ से अलग करती है ।

रश्मि की कवितायें सहज पठनीय हैं बिना ना नुकुर किये आप पढ़ते चले जाते हैं भाषा का प्रवाह भावों के सम बहता चला जाता है पर कविता जहां रुकती है आप दर्द से कराह उठते हैं ये दुख की साम्यता पाठक को  कवि मन से जोड़ती है और यही कवि की सफलता भी है औचक से खड़ा पाठक दोबारा तिबारा पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पाता इस दर्द को शब्दों में पिरोना कदाचित एक असाधारण कार्य है जो रश्मि ने बख़ूबी किया है ।

उनकी कलम और निखरे वो इसी तरह सशक्त ढंग से बात रखती रहें यही शुभकामनायें ।

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