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Sunday, December 9, 2018

#२# विश्वविद्यालय के दिन: अंजनी कुमार पांडेय

इलाहाबाद और सिनेमा 


स्कूल की दहलीज़ लाँघने और कॉलेज कैम्पस मे क़दम रखते ही मेरे जीवन मे जो सबसे बड़ा परिवर्तन आया ,  वह था बिंदास फ़िल्में देखने की आज़ादी ...  

इसको आज़ादी कहने के पीछे भी एक वजह है ....

स्कूल मे पढ़ते समय आप हमेशा एक दायरे मे रहते हैं या फिर यह बोला जाये कि एक दायरा बना दिया जाता है आपके चारों ओर ... और उस दायरे को समय समय पर परिवार और टीचरों द्वारा जायज़ भी ठहराया जाता है ... कहाँ जाना है , कब जाना है , क्या करना है , कैसे करना है , क्या बनना है और क्या नही बनना है ....
श्री अंजनी पांडेय 


क्या नही करना है उसमें सबसे पहला नंबर था फ़िल्मों का ...फिल्में देखना मेरे समय मे बहुत अच्छा नहीं माना जाता था , ख़ासकर तब कि जब आप मध्यम वर्ग से ताल्लुक़ रखते हों ...तमाम तरह की बातें सुनने को मिलती थी अगर आपने फिल्म की बात की ....

फलाने का लड़का बहुत पिक्चर देखता है ...तुम उस समय पिक्चर हॉल के सामने क्या कर रहे थे ...आजकल के लड़कों को बस सिनेमा देखना है , पढ़ाई लिखाई से कोई मतलब नही ....

कुल मिलाकर फ़िल्मे देखना एक बुरी आदत का प्रतीक थी ...यहाँ तक की फ़िल्म देखने का ख़याल आना भी किसी अपराध से कम नही...

ख़ैर जब तक स्कूल की चारदीवारी मे रहे , पिक्चर हॉल से दूर ही रहे ... जैसे ही कॉलेज मे इंट्री हुई, मानो पिक्चर हॉल ख़ुद ही चलकर मेरे कॉलेज पहुँच गया हो ... फिर तो मानो एक सिलसिला सा बन गया हो फ़िल्मे देखने का ... मैं , और फ़िल्मे , और बेहिसाब फ़िल्मे ...


इलाहाबाद मे उन दिनों बहुत सिनेमाघर थे और हर तरह के ... तब मल्टीप्लेक्स नही होते थे ...बस सिंगल स्क्रीन टॉकीज और दिन के चार शो ...कुछ सस्ते कुछ महँगे कुछ अच्छे और शायद कुछ घटिया ... लेकिन हमें सबसे सुलभ थे ... गौतम -संगीत -दर्पण  और पायल-झंकार ... मेरे यूइंग क्रिश्चियन कॉलेज के पास , दो मिनट मे पहुँचना , सबसे आगे वाली सीट और सिर्फ़ पाँच रुपये मे ... ख़ूब फ़िल्मे देंखी हैं इन पाँच टॉकीजों मे ...जब मन किया कॉलेज से निकलकर टॉकीज मे और फ़िल्मों के दौर ... पायल टॉकीज के सामने एक छोले चावल की दुकान भी थी...दो रूपयों मे इतना स्वादिष्ट छोला चावल मुझे दोबारा खाने को नही मिला ... 

पैलेस मूवी हॉल, इलाहाबाद 
यूनिवर्सिटी पहुँचने पर एक और टॉकीज आया जीवन मे , लक्ष्मी टॉकीज  ... लक्ष्मी टॉकीज ज़रूर किसी समाजवादी का होगा ... कोई भी पिक्चर हो एक ही दाम ... पहली सीट से लेकर आख़िरी सीट , सब एक जैसी , कहीं भी बैठ जाइये और टिकट चेकिंग वाला केवल टार्च मारता था ... ख़ैर लक्ष्मी टॉकीज पर जो मक्खन ब्रेड खाया कि मानो और कुछ नही स्वाद देगा जीवन भर ....

वह फ़िल्मे , वह समय , वह उम्र , सब कुछ रोमांच जैसा था ... हक़ीक़त से कहीं दूर जाने की इच्छा ...ख़्वाबों मे रहना और ख़्वाबों मे जीना ... और फ़िल्मों ने हमेशा ही उन ख़्वाबों मे भी रोमांच को बढ़ाया है ...

बहुत फ़िल्मे देखी जीवन के उन पांच सालों मे ...कुछ अच्छी फ़िल्मे , कुछ ख़राब फ़िल्मे , कुछ देखने लायक फ़िल्मे और कुछ ना देखने लायक फ़िल्मे ... बहुत कुछ सीखा जो सीखना चाहिये था ...वह भी सीखा जो नही सीखना चाहिये था ... वह दौर बेहतरीन था ,वह साथी लाजवाब थे और वह फ़िल्मे अनमोल थीं ....

आज जब पलट कर वापस देखता हूँ उन सिनेमाघरों की तरफ़ तो लगता है कि किसी विद्यालय से कम नहीं हैं वो ...बहुत कुछ सिखाया उन फ़िल्मों ने जो शायद किताबों मे नही सीख पाता ...डीडीएलजे का राज हो या शूल का समर प्रताप सिंह...सब थोड़ा थोड़ा से बसे हैं कहीं भीतर ...मोहब्बतें का शंकर नारायण अभी भी प्रभावित करता है ...हासिल का गौरीशंकर और रनविजय सिंह अभी भी जीवंत हैं ...सब कुछ ना कुछ सीख देकर गये...

मुझे लगता है कि सिनेमा देखना चाहिये और ख़ूब देखना चाहिये ... सोशल लर्निंग का इससे बेहतर माध्यम कोई नही हो सकता ...

मेरे जीवन के फ़लसफ़े मे फ़िल्मे बेशुमार हैं ...क्योंकि ...मेरे लिये फ़िल्मे देखना एक आज़ादी का प्रतीक हैं ....!

भाग-१ के लिए क्लिक करें !

@अंजनी कुमार पांडेय 
पुराछात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय 
लेखक भारतीय राजस्व सेवा २०१० बैच के अधिकारी हैं और वर्तमान मे प्रतिनियुक्ति पर विदेश मंत्रालय मे रीजनल पासपोर्ट ऑफिसर के पद पर सूरत मे तैनात हैं ।

Wednesday, November 28, 2018

#१ # विश्वविद्यालय के दिन: अंजनी कुमार पांडेय

युनिवर्सिटी रोड ...
श्री अंजनी पांडेय 
इलाहाबाद का नाम आये और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की चर्चा ना हो ...ऐसा तो हो ही नही सकता...और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का नाम आये और यूनिवर्सिटी रोड की चर्चा ना हो ...ऐसा तो किसी कीमत पर नही हो सकता....। कुछ तो है इस रोड पर ...जो सुबह से दोपहर...दोपहर से शाम...और शाम से रात...स्टूडेंट्स का मजमा जमा रहता है यहां....। मनमोहन पार्क से लेकर यूनियन गेट तक जाती हुई यह रोड ...करीब एक किलोमीटर का दायरा तय करती हुई यह रोड...अमरनाथ झा और सर सुंदर लाल हास्टल को अपने मे समेटे हुई यह रोड ...कापी किताब की दुकानों और चाय के ठेलों से पटी हुई यह रोड....केवल एक रोड नही है... यह एक हिस्सा है इलाहाबादी जीवन का... एक जरिया है सपनों के सच होने का... एक अहसास है जीवन मे जान होने का...और एक नदी है आशा की,  जिसे पार करके हर एक स्टूडेंट जीवन के संघर्षों मे नई गाथा लिखता है....। 


अगर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी एक शरीर है तो यूनिवर्सिटी रोड इसकी आत्मा है ... अगर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी एक दिल है तो यूनिवर्सिटी रोड उसमे उपजा पवित्र प्रेम है...अगर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी एक पुष्प है तो यकीनन इस पुष्प की महक सबसे ज्यादा युनिवर्सिटी रोड पर बिखरी मिलेगी....। चाहे कितनी भी उपमाओं को समेट लिया जाये ...यूनिवर्सिटी रोड पर निरंतर फैले जीवन के रंगों को समेटना यकीनन नामुमकिन है...ऐसी है इलाहाबाद की युनिवर्सिटी रोड...सपनों की रोड ...मेरी रोड...मेरे दोस्तों की रोड...इलाहाबाद के हर स्टूडेंट की रोड....।


शायद इसी रोड पर चलते हुये धर्मवीर भारती ने गुनाहों के देवता को जिया होगा ...शायद यहीं कहीं महादेवी ने अपने प्रेम को खोया होगा ...शायद यहीं कही बच्चन ने प्याले छलकाये होंगे...और शायद यहीं कहीं फिराक गोरखपुरी ने मौसम की शरारत को महसूस किया होगा... इतने महान लोगों को जिसने अपने सीने पर जगह दी हो...वह रोड  ही कालजयी ग्रंथों की रचना की साक्षी हो सकती है ...और यकीनन ऐसी रोड मामूली नही  हो सकती....।


संभवतः आज वो महान लोग नहीं हैं इस दुनिया मे ...लेकिन उनके जीवन से प्रेरणा लेने वाले आज भी बहुतेरे हैं...आज भी जब कोई किशोर गोरखपुर के किसी गांव से इलाहाबाद पढने आता है तो उसे पता होता है कि उर्दू का बेमिसाल शायर फिराक गोरखपुरी इसी जगह से संघर्ष करके इलाहाबाद युनिवर्सिटी के  इंग्लिश डिपार्टमेंट का हेड बना ... आज भी जब कोई लड़का प्रतापगढ की किसी बस्ती से निकलकर यहां पहुंचता है तो वह जानता है कि हरिवंश राय को बच्चन इसी माहौल ने बनाया ....जब कोई लड़की घर से बाहर निकलकर भरी सड़क पर अकेली निकलती है तब वो जानती है कि नीर भरी दुख की बदली महादेवी वर्मा प्रयाग विद्यापीठ की प्राचार्या थी...और शायद यही सब बातें यहां के स्टूडेंट्स को संबल प्रदान करती हैं...और शायद यही है कारण यहां के विद्यार्थियों के जुझारूपन का...और शायद यही है वजह की जीवन के  हर पाठ को बखूबी से समझने की हिम्मत इस रोड से गुजरने वाला हर संघर्षशील युवक  रखता है ....और शायद यही संघर्ष हर इलाहाबादी विद्यार्थी को आसमानो से भी ऊपर ले जाता है ।


आज भी मै देख सकता हूँ मै अपने आप को ... युनिवर्सिटी रोड पर एवन साइकिल से जाता हुआ ...सत्रह साल का संघर्षरत लड़का... कभी अकेला...कभी दोस्तों के साथ... कभी भीड़ मे...कभी तन्हाई मे... कभी सर्दियों मे एक रूपये की चाय के लिये  चाय की दुकान पर इंतजार करता...कभी गर्मियों मे रोड के किनारे छांह ढूंढता...कभी सपनों मे जीता हुआ....कभी जीवन मे सपने देखता...कभी दोस्तों के साथ मस्ती कर्ता ...कभी प्रेमगीत गाता कवि बनता....।
कितने ही पूरे होते सपनों की गवाह है यह रोड ...कितने ही बिखरे सपनों का दर्द लिये है यह रोड... कितने ही प्रेम पनपे यहां पर ...और शायद कितनी नदियां बही विरह की यहां... शायद यही जीवन है ...और शायद यही हैं जीवन के रंग...इन सबको अपने मे समेटे युनिवर्सिटी रोड आज भी जीवन को नये मायने प्रदान  कर रही है ....।


आज फिर गुजरा हूँ युनिवर्सिटी रोड से...

आज फिर एक सपना देखा किसी किशोर ने...
आज फिर मिला धर्मवीर के चंदर से...
आज फिर एक सुधा विरह मे थी...
आज फिर एक शाम मधुशाला के नाम...

आज फिर गुजरा हूँ युनिवर्सिटी रोड से ...!


शेष फिर कभी. 


@अंजनी कुमार पांडेय 
पुराछात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय 
लेखक भारतीय राजस्व सेवा २०१० बैच के अधिकारी हैं और वर्तमान मे प्रतिनियुक्ति पर विदेश मंत्रालय मे रीजनल पासपोर्ट ऑफिसर के पद पर सूरत मे तैनात हैं ।

Sunday, September 30, 2018

क्या आप सचमुच नागरिक हैं? - डॉ. श्रीश पाठक



वे कहते हैं पॉलिटिक्स वाहियात चीज है, दूर ही रहें तो बेहतर। मै कहता हूँ कि यह राजनीतिक अशिक्षा की स्थिति है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को पॉलिटिकल लिटरेसी की जरूरत है। वे भड़क पड़ते हैं। कहते हैं, किताबों से क्या होता है, ये अरस्तू, प्लेटो आज क्या कर लेंगे, मुझे भान है कि यूपी में क्या हो रहा, केरल, तमिलनाडु, बंगाल में क्या हो रहा और जो हो रहा वो कोई किताब पढ़कर नहीं हो रहा। मैंने उनसे कहा कि चश्में और आँख का फर्क समझते हों तो समझेंगे आप कि मै क्या कह रहा, फिर अगर आप यह महसूस करते हैं कि चीजों को देखने में आँखों से अधिक दिमाग की भूमिका होती है, तब तो बहुत कहना भी नहीं पड़ेगा। कुछ तो यहाँ तक कह देते हैं कि पान वाले जियादा बता देंगे पॉलिटिक्स के बारे में तुम अपनी पीएचडी सम्हाले रखो! ऊपरी तौर पर ठीक ही है यह आरोप!

देखिए अगर आप यह सोचते हैं कि सही कैंडीडेट को वोट देने का कोई फायदा नहीं है, वोट बेकार हो जाएगा और इससे अच्छा है कि विनिंग कैंडीडेट को वोट दे दिया जाय, तो जरूरत है, पॉलिटिकल लिटरेसी की। अगर आप सोचते हैं कि नोटा एक वाहियात विकल्प है तो माफ करिएगा जरूरत है आपको पॉलिटिकल लिटरेसी की। अगर आप सोचते हैं कि वोटर अपने क्षेत्र का सांसद नहीं बल्कि प्रधानमंत्री चुनता है तो जरूरत है पॉलिटिकल लिटरेसी की। अगर आप सोचते हैं कि चुनावों में व्यक्तियों, दलों की हार-जीत आपकी हार-जीत है तो जरूरत है पॉलिटिकल लिटरेसी की। अगर आप वोट ही देने नहीं जाते, तो जरूरत है पॉलिटिकल लिटरेसी की। अगर आपको लगता है कि देश की अर्थव्यवस्था पर आपके मतदान का कोई असर नहीं होता, अगर आप एक मतदाता के तौर पर लाचार महसूस करते हैं, विकल्‍पहीन महसूस करते हैं, अगर आपको सरकार के निर्णय समझ नहीं आते, अगर आपको अपने क्षेत्र के, समाज के, देश के बड़े मुद्दे नहीं पता, अगर अपने सांसद को देखते ही भय से हाथ जुड़ जाते हैं आपके, अगर आपके क्षेत्र का अधिकारी, नेता आपको धौंस दिखाता है, अगर प्रधान गाँव से जुड़े कागज नहीं दिखाता, तो आपको जरूरत है पॉलिटिकल लिटरेसी की।

पॉलिटिकल इल्लीट्रेसी के कुछ और सिम्टम हैं, लक्षण हैं !
आप इतने निराश होंगे राजनीति से कि इसे डिनर टाइम और दफ्तर के ब्रेक्‍स में महज एक मनोरंजन के तौर पर लेते होंगे। जैसे आप चल रहे मैच के अपडेट्‍स लेते होंगे वैसे ही कभी कभी नेताओं के बयानों पर खी-खी कर लेते होंगे। देखियेगा ध्यान से चुनाव में जीतना आपकी चिंता नहीं है, पर उन्होने इसे आपकी चिंता बना दिया होगा और आप जब तब उधेड़बुन में लगे होंगे कि कौन आएगा इसबार । नोटा नेताओं को बेकार बताने का जरिया है, पर वे और आप एक सुर में नोटा को ही बेकार बता रहे होंगे। आप पार्टियों का मेनीफेस्टो बिल्कुल नहीं खंगालते होंगे। पाँच साल बाद सीटिंग सांसद के दल के घर-आए कार्यकर्ता से उसका पिछला घोषणापत्र खोलकर हिसाब भी नहीं मांगते होंगे आप, आप तो उसके या नेता जी के घर आने से ही लहालोट हो जाते होंगे। ध्यान दीजिएगा जिन मुद्दों पर आप सुबह-शाम बात करते होंगे वे मुद्दे आपको टीवी ने दिए होंगे या नेताजी के कारिंदो ने आपको सुझाए होंगे, जबकि मुद्दे आपके होने थे, आपके क्षेत्र के होने थे। कहीं आपको मजा तो नहीं आने लगा है टीवी बहस देखकर जब आपकी फेवरिट पार्टी का प्रवक्ता दूसरी पार्टी के प्रवक्ता को यह कहकर निरुत्तर कर देता है कि आपने भी तो यही किया था! एक स्थिर मजबूत सरकार की जरूरत आपको तो महसूस नहीं होने लग रही क्योंकि यह आपकी जरूरत नहीं, सत्ताखोरों की जरूरत है। देश को दो कार्यपालिका चलाती है, स्थिर और अस्थिर। स्थिर कार्यपालिका परीक्षा से आती है और यह लगातार नीतियों के अनुरूप देश को चलाती रहती है वहीं अस्थिर कार्यपालिका चुनाव से आती है और संविधान ने ही इसे प्रकृति में ही अस्थिर बनाया है ताकि यह मनमानी न करने पाए और जनता का राज कायम रहे। कहीं आप गठबंधन की राजनीति की आलोचना तो नहीं करते क्योंकि आपको लगता है इससे चलाने में मशक्कत करनी पड़ती है, बिल्कुल ठीक सोच रहे आप, लेकिन भारत जैसे देश विविधता वाले देश में यह मशक्कत जरूरी है, इससे राजनीतिक विकास होता है अन्यथा पाँच साल तक एक सरकार पर कोई अंकुश नहीं रह जाता। कहीं आप यह तो नहीं सोचते कि मध्यावधि चुनाव से बोझ बढ़ेगा और आप यह कत्तई नहीं सोच पाते कि एक नकारा स्थिर सरकार के घोटालों से कितना अकल्पनीय बोझ बढ़ेगा। आप एक मतदाता के रूप में किसी के पास नहीं जाते कि जी आप मेरे खातिर चुनाव लड़ो, लोग आते हैं आपके पास। आप अपने प्राकृतिक अधिकार का एक हिस्सा मत के रूप में उसे देते हैं ताकि वह सुशासन करे। कहीं आप भोलेपन में यह तो नहीं सोचते कि हमें सरकार की आलोचना नहीं करना चाहिए। आप से कोई दूसरा देशवासी अलग राय रखता है तो कहीं आप यह तो नहीं सोचते कि मेरा दल सत्ता में है तो मेरा काम पहले हो। आप अपने नेता की जाति देखकर अगर फूले नहीं समाते तो आप में पॉलिटिकल लिटरेसी की कमी है। आपका नेता आपके देश में रहने वाले किसी और मजहब, किसी और संस्कृति के लोगों के बारे में घृणास्पद बातें कहता है और आपको भीतर कहीं सुकून मिलता है, आप तालियाँ बजाते हैं तो आप पोलिटीकली इल्लीट्रेट हैं। आप अगर किसी धर्म या जाति आधारित दल के मेंबर बनकर किसी गर्व में हैं तो माफ करें आपने अपनी नागरिक होने की प्राथमिक योग्यता ही खो दी है, राजनीतिक अशिक्षित तो आप हैं ही!

आपके पास अपने नेता, अपने सरकार के लिए कोई सवाल नहीं है तो आप अपने देश की राजनीति के लिए निरर्थक हैं। आप यदि चमक-दमक, रौब और टीवी डिबेट देखकर अपना वोट देते हो तो आप राजनीति के खांटी गँवार हो, वे यकीनन वे भेड़ों की तरह आपका एक वोट बैंक की माफिक इस्तेमाल करते होंगे। आपको यकीनन अंदाजा नहीं होगा कि धर्म के मुद्दे सुलझाने के लिए सरकारें नहीं चुनी जातीं। आपको यह भी नहीं पता होगा कि देश के सुरक्षा से जुड़े मुद्दे सार्वजानिक तौर पर नहीं उछाले जाते। देखिए कहीं ऐसा तो नहीं कि आप सामाजिक, सांस्कृतिक व धार्मिक मामलों पर भी अपने नेता का मुँह ताकते हैं, यदि ऐसा है तो आप यकीनन राजनीतिक रूप से इस्तेमाल किए जा रहे होंगे । कैसे बलात्कार जैसा जघन्य अपराध हो गया, बार-बार हो गया, इसके बजाय यदि आप यह देखते हैं कि बलात्कार असल में हुआ या नहीं तो माफ करिए आप सामाजिक जीवन और राजनीतिक जीवन की रेखा अलग अलग बिलकुल नहीं पहचान पा रहे।

फिर देखिए, अकेले में खुद से पूछिएगा कि क्या मै देश, समाज, सेना, राष्ट्र, देशप्रेम, राष्ट्रवाद, धर्म, संस्कृति और सरकार का अर्थ ठीक-ठीक और अलग-अलग समझता हूँ अगर ईमानदारी का उत्तर 'नहीं' है तो बंधु आपके लिए पॉलिटिकल लिटरेसी की जरूरत है और हाँ यह पान की दुकान पर नहीं मिलेगी।

देश से प्यार है तो राजनीतिक रूप से शिक्षित बनिए!

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