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Sunday, September 30, 2018

क्या आप सचमुच नागरिक हैं? - डॉ. श्रीश पाठक



वे कहते हैं पॉलिटिक्स वाहियात चीज है, दूर ही रहें तो बेहतर। मै कहता हूँ कि यह राजनीतिक अशिक्षा की स्थिति है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को पॉलिटिकल लिटरेसी की जरूरत है। वे भड़क पड़ते हैं। कहते हैं, किताबों से क्या होता है, ये अरस्तू, प्लेटो आज क्या कर लेंगे, मुझे भान है कि यूपी में क्या हो रहा, केरल, तमिलनाडु, बंगाल में क्या हो रहा और जो हो रहा वो कोई किताब पढ़कर नहीं हो रहा। मैंने उनसे कहा कि चश्में और आँख का फर्क समझते हों तो समझेंगे आप कि मै क्या कह रहा, फिर अगर आप यह महसूस करते हैं कि चीजों को देखने में आँखों से अधिक दिमाग की भूमिका होती है, तब तो बहुत कहना भी नहीं पड़ेगा। कुछ तो यहाँ तक कह देते हैं कि पान वाले जियादा बता देंगे पॉलिटिक्स के बारे में तुम अपनी पीएचडी सम्हाले रखो! ऊपरी तौर पर ठीक ही है यह आरोप!

देखिए अगर आप यह सोचते हैं कि सही कैंडीडेट को वोट देने का कोई फायदा नहीं है, वोट बेकार हो जाएगा और इससे अच्छा है कि विनिंग कैंडीडेट को वोट दे दिया जाय, तो जरूरत है, पॉलिटिकल लिटरेसी की। अगर आप सोचते हैं कि नोटा एक वाहियात विकल्प है तो माफ करिएगा जरूरत है आपको पॉलिटिकल लिटरेसी की। अगर आप सोचते हैं कि वोटर अपने क्षेत्र का सांसद नहीं बल्कि प्रधानमंत्री चुनता है तो जरूरत है पॉलिटिकल लिटरेसी की। अगर आप सोचते हैं कि चुनावों में व्यक्तियों, दलों की हार-जीत आपकी हार-जीत है तो जरूरत है पॉलिटिकल लिटरेसी की। अगर आप वोट ही देने नहीं जाते, तो जरूरत है पॉलिटिकल लिटरेसी की। अगर आपको लगता है कि देश की अर्थव्यवस्था पर आपके मतदान का कोई असर नहीं होता, अगर आप एक मतदाता के तौर पर लाचार महसूस करते हैं, विकल्‍पहीन महसूस करते हैं, अगर आपको सरकार के निर्णय समझ नहीं आते, अगर आपको अपने क्षेत्र के, समाज के, देश के बड़े मुद्दे नहीं पता, अगर अपने सांसद को देखते ही भय से हाथ जुड़ जाते हैं आपके, अगर आपके क्षेत्र का अधिकारी, नेता आपको धौंस दिखाता है, अगर प्रधान गाँव से जुड़े कागज नहीं दिखाता, तो आपको जरूरत है पॉलिटिकल लिटरेसी की।

पॉलिटिकल इल्लीट्रेसी के कुछ और सिम्टम हैं, लक्षण हैं !
आप इतने निराश होंगे राजनीति से कि इसे डिनर टाइम और दफ्तर के ब्रेक्‍स में महज एक मनोरंजन के तौर पर लेते होंगे। जैसे आप चल रहे मैच के अपडेट्‍स लेते होंगे वैसे ही कभी कभी नेताओं के बयानों पर खी-खी कर लेते होंगे। देखियेगा ध्यान से चुनाव में जीतना आपकी चिंता नहीं है, पर उन्होने इसे आपकी चिंता बना दिया होगा और आप जब तब उधेड़बुन में लगे होंगे कि कौन आएगा इसबार । नोटा नेताओं को बेकार बताने का जरिया है, पर वे और आप एक सुर में नोटा को ही बेकार बता रहे होंगे। आप पार्टियों का मेनीफेस्टो बिल्कुल नहीं खंगालते होंगे। पाँच साल बाद सीटिंग सांसद के दल के घर-आए कार्यकर्ता से उसका पिछला घोषणापत्र खोलकर हिसाब भी नहीं मांगते होंगे आप, आप तो उसके या नेता जी के घर आने से ही लहालोट हो जाते होंगे। ध्यान दीजिएगा जिन मुद्दों पर आप सुबह-शाम बात करते होंगे वे मुद्दे आपको टीवी ने दिए होंगे या नेताजी के कारिंदो ने आपको सुझाए होंगे, जबकि मुद्दे आपके होने थे, आपके क्षेत्र के होने थे। कहीं आपको मजा तो नहीं आने लगा है टीवी बहस देखकर जब आपकी फेवरिट पार्टी का प्रवक्ता दूसरी पार्टी के प्रवक्ता को यह कहकर निरुत्तर कर देता है कि आपने भी तो यही किया था! एक स्थिर मजबूत सरकार की जरूरत आपको तो महसूस नहीं होने लग रही क्योंकि यह आपकी जरूरत नहीं, सत्ताखोरों की जरूरत है। देश को दो कार्यपालिका चलाती है, स्थिर और अस्थिर। स्थिर कार्यपालिका परीक्षा से आती है और यह लगातार नीतियों के अनुरूप देश को चलाती रहती है वहीं अस्थिर कार्यपालिका चुनाव से आती है और संविधान ने ही इसे प्रकृति में ही अस्थिर बनाया है ताकि यह मनमानी न करने पाए और जनता का राज कायम रहे। कहीं आप गठबंधन की राजनीति की आलोचना तो नहीं करते क्योंकि आपको लगता है इससे चलाने में मशक्कत करनी पड़ती है, बिल्कुल ठीक सोच रहे आप, लेकिन भारत जैसे देश विविधता वाले देश में यह मशक्कत जरूरी है, इससे राजनीतिक विकास होता है अन्यथा पाँच साल तक एक सरकार पर कोई अंकुश नहीं रह जाता। कहीं आप यह तो नहीं सोचते कि मध्यावधि चुनाव से बोझ बढ़ेगा और आप यह कत्तई नहीं सोच पाते कि एक नकारा स्थिर सरकार के घोटालों से कितना अकल्पनीय बोझ बढ़ेगा। आप एक मतदाता के रूप में किसी के पास नहीं जाते कि जी आप मेरे खातिर चुनाव लड़ो, लोग आते हैं आपके पास। आप अपने प्राकृतिक अधिकार का एक हिस्सा मत के रूप में उसे देते हैं ताकि वह सुशासन करे। कहीं आप भोलेपन में यह तो नहीं सोचते कि हमें सरकार की आलोचना नहीं करना चाहिए। आप से कोई दूसरा देशवासी अलग राय रखता है तो कहीं आप यह तो नहीं सोचते कि मेरा दल सत्ता में है तो मेरा काम पहले हो। आप अपने नेता की जाति देखकर अगर फूले नहीं समाते तो आप में पॉलिटिकल लिटरेसी की कमी है। आपका नेता आपके देश में रहने वाले किसी और मजहब, किसी और संस्कृति के लोगों के बारे में घृणास्पद बातें कहता है और आपको भीतर कहीं सुकून मिलता है, आप तालियाँ बजाते हैं तो आप पोलिटीकली इल्लीट्रेट हैं। आप अगर किसी धर्म या जाति आधारित दल के मेंबर बनकर किसी गर्व में हैं तो माफ करें आपने अपनी नागरिक होने की प्राथमिक योग्यता ही खो दी है, राजनीतिक अशिक्षित तो आप हैं ही!

आपके पास अपने नेता, अपने सरकार के लिए कोई सवाल नहीं है तो आप अपने देश की राजनीति के लिए निरर्थक हैं। आप यदि चमक-दमक, रौब और टीवी डिबेट देखकर अपना वोट देते हो तो आप राजनीति के खांटी गँवार हो, वे यकीनन वे भेड़ों की तरह आपका एक वोट बैंक की माफिक इस्तेमाल करते होंगे। आपको यकीनन अंदाजा नहीं होगा कि धर्म के मुद्दे सुलझाने के लिए सरकारें नहीं चुनी जातीं। आपको यह भी नहीं पता होगा कि देश के सुरक्षा से जुड़े मुद्दे सार्वजानिक तौर पर नहीं उछाले जाते। देखिए कहीं ऐसा तो नहीं कि आप सामाजिक, सांस्कृतिक व धार्मिक मामलों पर भी अपने नेता का मुँह ताकते हैं, यदि ऐसा है तो आप यकीनन राजनीतिक रूप से इस्तेमाल किए जा रहे होंगे । कैसे बलात्कार जैसा जघन्य अपराध हो गया, बार-बार हो गया, इसके बजाय यदि आप यह देखते हैं कि बलात्कार असल में हुआ या नहीं तो माफ करिए आप सामाजिक जीवन और राजनीतिक जीवन की रेखा अलग अलग बिलकुल नहीं पहचान पा रहे।

फिर देखिए, अकेले में खुद से पूछिएगा कि क्या मै देश, समाज, सेना, राष्ट्र, देशप्रेम, राष्ट्रवाद, धर्म, संस्कृति और सरकार का अर्थ ठीक-ठीक और अलग-अलग समझता हूँ अगर ईमानदारी का उत्तर 'नहीं' है तो बंधु आपके लिए पॉलिटिकल लिटरेसी की जरूरत है और हाँ यह पान की दुकान पर नहीं मिलेगी।

देश से प्यार है तो राजनीतिक रूप से शिक्षित बनिए!

#पॉलिटिकल_लिटरेसी
#राजनीतिक_शिक्षा

#श्रीशउवाच


Monday, May 28, 2018

चार्ल्स बडलयर की कुछ कविताओं का हिंदी अनुवाद: अभिषेक 'आर्जव '

देवी नागरानी जी द्वारा किये गए सिंधी कथा संग्रह के हिंदी अनुवाद की समीक्षा करते हुए मैंने सेतु पर लिखा था: 

आर्जव 
"दो भाषाएं अपने साथ दो संस्कृतियों के आरोह-अवरोह भी लिए चलती हैं। उनमें संभव संवाद की गुंजायश अनुवाद टटोलते हैं और दोनों लहरें पारस्परिकता का ताप एवं संवेग साझा कर लेती हैं। अनुवाद का तनिक विचलन इन अन्यान्य सूक्ष्म प्रक्रियाओं को गहरे प्रभावित करती हैं, इसलिए अनुवाद का कार्य एक चुनौतीपूर्ण कार्य तो है ही, साथ ही यह बड़े ही सांस्कृतिक महत्त्व का अनुष्ठान है। दो भिन्न लिपियों का, दो भिन्न भाषाओँ का सम्यक ज्ञान, उनके अनेकानेक विविधताओं के संस्तर का बोध और फिर इनका संयत निर्वहन अनुवाद की प्राकृतिक मांग है।"

आर्जव, अपनी लेखनी में प्रतिबद्ध हैं। उनके सहज अनुवाद में समन्वय का शिल्प देखा जा सकता है।


***

चार्ल्स बडलयर उन्नीसवीं सदी फ्रांस के साहित्यिक परिदृश्य के प्रमुख कवि हैं. ९ अप्रैल १८२१को पेरिस में जन्मे चार्ल्स एक प्रखर कवि होने के साथ साथ अपने समय के प्रख्यात कला-आलोचक, महान गद्य लेखक, प्रभावी अनुवादक भी थे. औद्योगीकरण के प्रभाव में तेजी से बदल रहे अपने आसपास के समाज की स्थितियों, हो रहे परिवर्तनों के सापेक्ष एक आम आदमी के जीवन में, मन में, संवेदन में हो रही हलचलों को चार्ल्स ने अपने रचना संसार में बड़ी ही बखूबी से उकेरा है.

हालांकि उन्होंने अपना पहला कविता संग्रह १८४५ में प्रकाशित किया लेकिन उनकी प्रसिध्दि मुख्य रूप से १८५७ में प्रकाशित “फ्लावर आफ़ द ईविल” नामक कविता संग्रह से है. उनके लेखन में मुख्य रूप से  तीव्र प्रेम, काम, हिंसा, शहरी भ्रष्टाचार, बदलाव, लेस्बियनिज्म,तनाव, वीभत्सता, मृत्यु, व्याकुलता इत्यादि बार बार अलग अलग रूपकों में पाठकॊ से सम्मुख आते हैं. प्रस्तुत कवितायें “फ्लावर आफ़ द ईविल” से ली गयी हैं. 

अभिषेक आर्जव; विलुप्त होने की कगार पर एक पुराना ब्लागर !

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अल्बाट्रोस

अक्सर ऊब रहे नाविक पकड़ लेते हैं

समुद्र के महान पक्षी अल्बाट्रोस को,

नीले आकाश का वह सौम्य यात्री

गूढ़ समुद्र में पीछा करता है जहाजों का !


नाविक जब पकड़ लेते हैं उसे, घायल-त्रस्त,

ये व्योम-नृप, पड़े यहां वहां जहाज के तख्त पर,

लिये दृढ़-महान पंख, हो चुके बेकार-सी पतवार-से

घिसटते हैं नाव के ओर छोर पर,


यह मजबूर ,हास्यास्पद यात्री, पड़ा है जो

विकृत और अक्षम, कभी हुआ करता था कितना भव्य !

एक नाविक कोंचता है चोंच में लकड़ी से,

दूसरा हंसता है उसकी लड़खड़ाती चाल पर !


कवि भी! बादलॊं का सहयात्री है! जोहता तूफान भरे दिन,

तीरन्दाजों पर करता उपहास,किन्तु जमीन पर चींखती भीड़ के बीच

वह चल भी नहीं सकता, उसके दृढ़-विशाल पंख

रास्ते की रुकावट बनते हैं !


Amedeo Modigliani's "Iris Tree."

पाठक से !

मूढ़ता गलतियां  लिचड़ता पाप

किये आवृत्त हमारी आत्मा को ,

शिराओं में भरते लिजलिजापन

पालते हैं  हम अपना नपुंसक प्रायश्चित्त

ठीक वैसे ही जैसे सड़क का भिखारी

रखता है अपने नपुंसक पिस्सुओं को !


हमारे कुत्सित  पापों के हैं  क्षीण पश्चाताप,

लेकर सत्य निष्ठा की शपथ  हर बार

हम करते हैं  और व्यग्रता से नए पाप

मानकर की मक्कार आसुओं से धुलेंगे हमारे दाग !


अपनी जगह पर कुंडली मारे बैठा है  जादूयी दैत्य

फेंक कर भ्रम-जाल हमारी बंधुआ आत्मा पर

अपने काले-जादू से सोख लेता है सारा सत्व !


प्रतिपल प्रतिपग चहुँओर  हमारे  दैत्य का साया है

हर कुत्सित अमार्जित वस्तु में सुख हमने पाया है,

घिसटते हैं हम हर रोज नर्क में थोड़ा और  आगे

अनाक्रान्त अविचलित नरक की सड़ांध से !


दरिद्र लम्पट जैसे चूसता चूमता है

किसी अधेड़ वेश्या के नोचे गए पिलपिले वक्ष वैसे ही,

हम मौक़ा पाते ही भोग लेते हैं तुच्छ नीच वर्जित सुख

यूँ कि  किसी सूखे संतरे को हम मसल लेते हैं !


गहरे अंदर करोड़ो बजबजाते कीड़ो -कृमियों की तरह

एक दैत्य गणराज्य हमारे मस्तिष्क में करता है सतत उत्पात

जब हम सांस लेते हैं हमारे फेफड़ो तक पसरती है मौत

दुःख भरे क्रन्दनों की अदृश्य धारा  में आवृत !


नरसंहार दंगे हत्या बलात्कार अगर अभी तक

हमारे सुख का हिस्सा नहीं हुए हैं

नहीं बने हैं हमारे भाग्य का अंग

तो मात्र इसलिए की नहीं  है हमारी शिराओ में इतना दम !


सब सियार तेंदुए भेड़िये,

बन्दर बिच्छु गिध्द सांप

सब चींखते बलबलाते सरकते जानवर

जैसे हमारे अंतस की अनेक बुराईयों की समग्र आवाज !


किन्तु एक जंतु जो  है सबसे ज्यादा फरेबी और मक्कार,

बिना किसी दिखावे के शोरगुल के

वह स्वेच्छया कर सकता है पूरी धरती तबाह

निगल सकता है एक ही झटके में अखिल विश्व !


वह है  बोरियत --

आँखों  मे  मादकता,

दीखते चमकते  आंसू लिए , हुक्का पीते

सपने देखते, हलकी सी मुस्कान लिए

मेरे प्रिय साथी ! मेरे पाखंडी पाठक !

निश्चित तौर पर तुम उसे जानते हो  !


दिन का अन्त

सांझ के धुंधलके में, जब सूरज खो जाता है,

अर्ध-चेतन वह—जीवन—थिरकता नांचता है

अपनी लज्जाहीन, भंगुर गुस्ताखियों के साथ !


जैसे ही प्रेमिल-शीतल रात बिखरती है क्षितिज पर

सब कुछ शान्त कर देती है वह, विलीन हो जाता है

तृषा, लज्जा, क्षोभ, वाष्प बनकर !



कवि खुद से कहता है,“अनन्त दुःस्वप्नों की छाया से

भरा मेरा हृदय, विश्राम मांगती मेरी आत्मा, मेरी मेरुरज्जु ,

पा सकेंगे थोड़ा आराम, अगर मैं लेट जाऊं,

स्वयं को तुम्हारी अंधेरी चादर में लपेट कर, ओ जीवनदायी अंधेरों !”


पूरी तरह एक

शैतान और मैं  कर रहे थे  बातें ,

मेरी खोह में बेपरवाह सा मुझे देख

विनीत भाव से पूछा उसने मुझसे--

''बहुत सी रसपूर्ण चीजों में, श्यामल व रक्ताभ मादकताओं में,

तुम्हें उसकी देह का कौन सा हिस्सा, सबसे अधिक खींचता है ?

क्या है सबसे अधिक मधुर?"


कहा मेरी  आत्मा ने लोलुप शैतान से,

''वह अपनी समग्रता में एक विश्रांति है, स्नेह है!

उसकी देह का कोई एक टुकड़ा नहीं मुझे प्रिय है,


वह भोर का उर्जित तारा है,

स्निग्ध रजनी  की  शांत कर देने वाली अनुभूति है !

उसकी लावण्यता की लय मे खो जाते है चिंतक विचारक !


ओ रहस्यमयी रूपांतरण !

मुझमें, मेरे सब संवेदन एकमेक हो गए है, क्योंकि

उसकी सांसों में भी संगीत है, उसकी भाषा मे मधु-गंध है !


उठान !

घाटियों नदियों झीलों के ऊपर ,

बादलों पहाड़ों जंगलों समुद्रों के ऊपर

सूरज से परे, व्योम के उस पार

सभी धुंधली सीमाओं से आगे !


मेरी स्फूर्त आत्मा ! तुम उड़ो !

जैसे कोई बलिष्ठ तैराक नापता हो समुद्र !

तुम जोत दो अनन्त विस्तार को

अकथ अपौरुषेय उन्माद में !


उठकर इस गंदले वायवीय स्थान से

बहुत ऊपर स्वच्छ हवा में

शोधन करो स्वयं का

साथ ही करो पान स्फटिक-श्वेत-व्योम उद्भूत

पवित्र दैवीय सोमरस का !


जीवन की उदासियों, समस्याओं से परे

जो कर देती है हमारी तीव्रता को श्लथ

उस प्रसन्न मजबूत पंखों वाले व्यक्ति की तरह

छलको ! प्रकाशपूर्ण सूदूरवर्ती विस्तार में !


उस व्यक्ति की तरह जिसके विचार

हंस-बलाका के मजबूत पंखॊं जैसे

हवा में हर सुबह होते हैं गतिशील

जो आच्छादित कर लेता है जीवन को,

समझता है फूलॊं की भाषा

सुनता है न बोलती चीजों की आवाज !

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Friday, April 20, 2018

दिल्ली की किताब / शचीन्द्र आर्य (दूसरी किश्त )

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(दूसरी किश्त) 

चाचा के लिए
अब जबकि कुछ देर में अंधेरा होने वाला है, सोच रहा हूँ, जहाँ से छोड़ा था, वहाँ से शुरू कैसे करूँ? यह बहुत मुश्किल प्रक्रिया है। आप अपने अंदर अतीत को उम्र में बहुत आगे बढ़ जाने के बाद पीछे मुड़कर देखते हैं। इस मुड़ने में बहुत सी बातें एक साथ कौंध जाती है पर मैं चाचा से शुरू करना चाहता हूँ। इसे गाँव से शहर में दाख़िल होने की तरह देखने से पहले इतना बताना ज़रूरी है कि इसी समानुपात में गाँव भी हममें प्रवेश करता है। वह एक बहुत पुरानी तस्वीर है, जिसमें छोटके चाचा ने मुझे गोद में ले रखा है। मम्मी उनके बगल में खड़ी हैं। चंद्रभान उनके दूसरी तरफ़ खड़े हैं। पीछे कुतुब मीनार है। तस्वीर ब्लैक एंड व्हाइट नहीं है। कलर है।

फ़ोटो पापा ने खींची है।

 ©शचीन्द्र आर्य 
यहाँ, इस तस्वीर से शुरू के पीछे सिर्फ़ एक वजह है। चाचा अपने बड़े भाई के यहाँ घूमने आए हैं। कुछ दिन साथ रह सकें। थोड़ा वक़्त बिता सकें। पापा बताते हैं, पापा चाचा को सिनेमा हाल में बिठा आते थे और तीन घंटे बाद दोबारा जाते और चाचा को घर ले आते। फ़िल्म देखने का बहुत शौक़ था। बहराइच के हरी टाकीज़ में बाहर तांगा खड़ा किया और सवा रुपए से भी कम पैसे में टिकट लेकर एक समोसे पर पूरा दिन बिता ले जाते। यह तांगा, उनका खड़खड़ा था, जो घोड़ी रखने की उनकी इच्छा के बाद मूर्त रूप लेता है। जब घर में कोचवान हो तब उनका उपयोग भी होता। दुकान का गल्ला उसपर लादते और बाबा के साथ जाकर उसे गल्ला मंडी में बेच आते। फ़िर एक मौसम आता, जब मोहर्रम के बाद बिसवां, चालीसवाँ तक दूर दूर गाँव में मेला लगता। जुलूस एक जगह आकर इकट्ठा होता और लगी हुई दुकानों से मनचाहा सामान खरीदता। बाबा की मिठाइयों की दुकान होती। चाचा उनके सहायक। कई मर्तबा तो हम भी गर्मी की छुट्टियों में उनके साथ साइकिल पर ऐसे छोटे बड़े मेलों में गए। 

Image Source-IBN7

यह गर्मियों की छुट्टियाँ ही होतीं, जहाँ हम अपने स्कूल का दिया काम जल्दी से खत्म करके गाँव जाने की धुन में रम जाते। गाँव के उस पीछे खपरैल वाले घर में सटर वाला दो रंगा टेलीविज़न कैसे पहुंचा, इसका कोई हवाला हमारी स्मृति में नहीं है। हमने उसे वहीं सीमेंट की टाड़ पर रखा हुआ देखा। हर इतवार दुकान में सौदा लेने आए बच्चे, जवान सब चार बजते ही मधुमक्खी की तरह दालान में भिनभिनाने लगते। चार बजे दिल्ली दूरदर्शन से फ़िल्म आने वाली होती। छत पर लगे सौर ऊर्जा पैनल से बैटरी चार्ज होती, और उसी से टीवी चलता। वहीं ताखे वाली अलमारी में तब मंदिर नहीं बना था। वहाँ मर्फी का टेपरिकॉर्डर रखा हुआ था। इसमें मीटर वेव और शॉर्ट वेव रेडियों भी था। पास ही कैसिटों का अंबार लगा हुआ था। चाचा जो कैसिट कहते पापा यह तो गर्मियों में अपने साथ लिए चलते या कोई आता जाता तब उसके हाथों भिजवा दिया करते। इस सबमें चाचा ही ऐसी धुरी थे, जो उस गाँव में बीत रहे वक़्त से बहुत आगे चल रहे थे। हम भी जितना वक़्त गाँव पर रहते उनके आस पास घूमते रहते। एंटीना घुमाने से लेकर टीवी चलाने के सारे अधिकार इन्हीं छोटके चाचा के पास थे। हम भी शहर से इतनी दूर एक शहर को उस मशीन में खोज रहे होते। ऐसा नहीं था, हम वक़्त बिताने के लिए सिर्फ़ यही काम किया करते। नहीं। हम पापा के मामा के यहाँ जाते। रवि के यहाँ बरवाँ जाते। गिलौला से सेवढ़ा, नानी के यहाँ जाते। ख़ूब सारी तसवीरों में वह पल अपने साथ हमेशा के लिए रख लिया करते। पर आज बात सिर्फ़ चाचा की। 

कोई कहे या न कहे, जब लकड़ों की शादी हो जाया करती है, तब जो लड़का नहीं कमाता है, वह सबकी आँख में किरकिरी की तरह चुभने लगता है। चाचा इस व्याख्या में श्रम विभाजन की सैद्धांतिकी में सिर्फ़ सहायक की भूमिका में थे। बिरेन्द चाचा जब बहराइच जाते, तब ननकू चाचा दुनाक संभालेंगे। गल्ला मंडी जाना होगा तब अपने खड़ खड़े को हाँकते हुए मंडी ले जाएँगे। कभी गाहे बगाहे बाबा के साथ किसी मेले में चले गए। इसके अलावे उनके हिस्से कोई काम पड़ता हुआ नहीं दिखता। घर में खेती लायक ज़मीन होती, तब बात ही क्या होती। सब अलग-अलग तरह के पेशों में संलग्न रहते। पर ऐसा हुआ नहीं। चाचा इस विभाजन में कहीं नहीं ठहरते। चाची के आने के बाद उनका भी परिवार अस्तित्व में आया। उनके साथ एक मसेहरी, चार कुर्सियाँ, एक मेज़ आए। थोड़े दिन यह दिखे। फ़िर कुछ साल पीछे हमारी बहनें हुईं। चाचा चाची के यहाँ लगातार तीन बेटिययों के बाद दो जुड़वा बच्चे हुए जो जन्म के दस दिन के भीतर मृत्यु को प्राप्त हुए। इसके कई साल पीछे शिवम हुआ। हमारा सबसे छोटा चचेरा भाई। 

जैसे-जैसे सदस्य बढ़े, आय के सीमित साधनों में झगड़ों का उदय हुआ। संयुक्त परिवार दरअसल एक समझौते पर कायम संस्था है और जो इसे बढ़िया मानते हुए स्वर्णिम अतीत में खो जाते हैं, उनसे मुझे कुछ नहीं कहना। वह शायद बड़ों के लिहाज और लगातार अपने आत्म सम्मान को ताक पर रखकर जिंदा संस्था है, जिसमें सिर्फ़ शोषण और बर्बरता के आदिम सूत्र आज भी दिख जाते हैं। इससे बचने का एक ही तरीका था। बँटवारा। चाचा के हिस्से चौराहे पर सड़क किनारे बनी दो दुकाने आयीं। जिसका उपयोग चाचा ने किसी थोक दुकान को शुरू करने के लिए नहीं किया। वह सपरिवार वहीं चले गए। आगे टीन छाई। जगह बढ़ गयी। वह उस जगह क्यों आइए इसका चाची के पास एक ही जवाब था। जो गाँव वाला टुटहा घर मिला है, वहाँ क्या साँप बिच्छु के बीच आपन बच्चे नचाई। 

कमाई के साधन के रूप में एक ढाबली ने ले ली। एक लकड़ी की संरचना, जिसमें एक वक़्त में सिर्फ़ एक ही व्यक्ति अंदर बैठ सकता है। सिर्फ़ बैठ सकता है। खड़ा नहीं हो सकता। इसी में पान मसाले, बीड़ी से लेकर माचिस, साबुन, नमकीन, बिसकुट सब थोड़ा-थोड़ा भर लिया। सुबह होते ही दुकान खुल जाती और देर रात ग्यारह बजे तक चाचा बैठे रहते। शिवम चाचा की तबीयत खराब होने के बाद से बैठने लगा। उसने पेट्रोल बेचना शुरू कर दिया। मूँगफली और लाई भी इसके बाद अलग तखत पर रखे जाने लगे। तेल पेट्रोल पंप पर जितने का बिकता है उसमें लाने और अपने पास रखने की लागत मिलाकर दाम बताया जाता। गरीबी का अनुवाद बकरियाँ भी हो सकता है, यह चाचा के यहाँ पहली बार अनुभव संसार का हिस्सा बना। बकरियाँ पालना इसके और कसाई के हाथों बेचना तीन-चार साल पहले बंद कर दिया। पापा हर बार जाते और यही कहते। पहले पालो और फ़िर किसी को मारने के लिए बेच दो। कभी ख़ुद भी सोचा होगा। तब तय किया होगा, अब नहीं पालेंगे। इसमें मनोज कुमार पाण्डेय की कहानी, 'पुरोहित जिसने बकरियाँ पाली' का कोई योगदान नहीं है। क्योंकि उन्होंने ऐसी कोई कहानी लिखी ही नहीं है। 

इधर चार पाँच साल से चाचा को पेचीस की शिकायत कुछ बढ़ गयी। उनका मन किसी भी काम में नहीं लगता। दिन में दस दस बार से भी ज़्यादा बार मैदान फिरने जाना पड़ता। तब पिछवाड़े शौचालय बनवाया नहीं था। वह बना ही इसलिए क्योंकि झाड़ा फिरने का कोई नियत समय नहीं था । कभी भी जाना पड़ सकता था। सेप्टिक टेंक के की खुदाई के बाद पक्की छत पड़ी और सीट बिठा दी गयी। पानी लाओ और बैठ जाओ। यह दरअसल उनके अंत की शुरुवात थी। उन्हें लगा, बवासीर है। सामने किसी ने ऑपरेशन करवाया था, उसका ठीक हो गया। वह भी करवाएँगे, ठीक हो जाएँगे । यही सोच पिछले साल बहराइच में सर्वेश शुक्ला के यहाँ फागुन के बाद संतराम फूफा के साथ एक सुबह चले गए। डॉक्टर इससे भी भोले हो सकते हैं, यह पता नहीं था। चाचा ने कहा, बवासीर है। डॉक्टर तुरंत मान गया। ऑपरेशन की तारीख दे दी। चाचा वक़्त पर पहुँच गए। डॉक्टर ने पैसा लिया और ऑपरेशन के नाम पर गूदा द्वार छोटा कर दिया। कहा अब ठीक हो जाओगे। 

चाचा डॉक्टर के कहे अनुसार ठीक नहीं हुए। सूख गए। देह में जान नहीं बची। उन्हें लगता, गूदा द्वार छोटा करने से पेट में गैस बनने लगी है और झाड़ा भी ठीक से नहीं उतरता है। वह अपनी बिगड़ती स्थिति के संबंध में किसी डॉक्टर से मिलना नहीं चाहते थे। तभी एक दिन लखनऊ से रीना के सुशील आए। वह जबर्दस्ती अपने चचिया ससुर को साथ ले गए। वहाँ डॉक्टर ने देखा। सीटी स्कैन करवाया। उसने कहा मलाशय (रेक्टम) का कैंसर है। यह बात चाचा को सीधे बताई नहीं गयी। सुशील का दिल्ली फ़ोन आया। पापा से बात हुई। गाँव का एक बाभन मिला, जो बहराइच में किसी श्याम गंभीर डॉक्टर के यहाँ ड्राइवरी करता था, उसने कहा, डॉक्टर साहब से बात करता हूँ। लखनऊ में किसी पहचान के अस्पताल में सस्ते में करवा देंगे। इस ऑपरेशन में गूदा मार्ग को बंद कर देते और मल निकासी के लिए प्लास्टिक की नली कहीं से निकाल देते। 

एक ऑपरेशन से ऐसी हालत में पहुँच जाने के बाद इस दूसरे ऑपरेशन के लिए वह मान नहीं रहे थे। किसी तरह कीमो थेरिपी के लिए माने। कीमो के ग्यारह दौर के बाद रेडियो थेरेपी शुरू होती। लेकिन पहली बार में ही हालत इस कदर बिगड़ गयी कि वापस अस्पताल जाने की हिम्मत नहीं हुई। चाचा ने तो कह दिया, घर ले चलो। जो होगा देखे लेंगे। हम सब वहीं थे। मूक दर्शक बनने के सिवा हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। हमें पता है, उनके पास अब गिनती के छह आठ महीने बचे हैं, पर चाह कर भी उन्हें बता नहीं सकते। पता नहीं उन्हें कैसे इस बात का एहसास हो गया। एक रात कहने लगे, नियामत भी लखनऊ आए थे। ठीक नहीं हो पाये। मैं भी ठीक नहीं होऊंगा। एक व्यक्ति हमारे सामने हार रहा है, हम कुछ नहीं कर पा रहे थे। ऐसा नहीं है वह ठीक नहीं होना चाहते थे। उनके मन में था, किसी तरह उनके शरीर में ताकत आ जाये। वह कहते, पहले, जब तबीयत ठीक थी, तब पता नहीं कितने किलोमीटर लगातार चल सकते थे। आज की तरह थोड़े कि छत से उतरते हुए हाँफने लगते। यह दुख लगातार बढ़ता रहा। कम हुआ ही नहीं। 

यह जुलाई की बात है। तब सीमा की शादी तय नहीं हुई थी। लड़के वाले आकर देख चुके थे। तारीख़ पर कहने लगे, नवरात्र के बाद बात करेंगे। लगता है चाचा अपनी उम्र को लेकर बिलकुल स्पष्ट हो गए थे। वह सिर्फ़ शादी में बैठे रहना चाहते थे। दिवाली के पहले लखनऊ दोबारा आए। मैं दिल्ली से उनका पैट स्कैन लेकर वहाँ पहुँच रहा था। गाड़ी पाँच घंटा लेट हो गयी।  जिसे सुबह सात बजे पहुँचना था, वह साढ़े बारह के लगभग चारबाग पहुंची। रिपोर्ट मेरे पहुँचने से पहले मोबाइल से अस्पताल पहुँच गयी। मेरा किंग जार्ज पहुँचना बेकार हो गया। डॉक्टर ने गंगा राम के कराया स्कैन देखा भी नहीं। सीधे अगले सम्बद्ध विभाग में फ़ाइल भेज दी। ओपीडी का वक़्त एक बजे ख़त्म हो गया। डॉक्टर ने कहा, कल सुबह आना। जिस ऑपरेशन के लिए तीन महीने पहले मना कर चुके थे, उसके लिए मान तो गए, पर इस बार डॉक्टर तय्यार नहीं हुए। कहने लगे, क्रिटिकल स्थिति है। शरीर में ख़ून नहीं है। अच्छा यही है, अब अपने परिवार के साथ रहें और वह उनकी जितनी सेवा करना चाहते हैं, कर लें। कभी भी कुछ भी हो सकता है।

इन ब्यौरों में हमारे भीतर चाचा के न होने की कोई कल्पना घर नहीं बना पायी। हम सोच ही नहीं पाये कि अगले साल इन दिनों चाचा कहीं नहीं होंगे। मैं लगातार इतनी बार उन्हें देखता रहा और अंदर ही अंदर उस दृश्य, जिसमें उन्हें आख़िरी बार देखुंगा, उसे गढ़ने लगा। मुझे हर बार लगता, चाचा जब नहीं होंगे, यही क्षण होगा, जो मुझे याद रह जाएगा। हमारे अंदर चाचा की जो छवि थी, वह आज के बदहाल चाचा की नहीं थी। हमारी यादों में वह एक सेहतमंद, तंदुरुस्त चाचा ही रह गए। हमें लगता, जिन्हें हम अपने सामने अभी देख रहे हैं, वह हमारे चाचा नहीं हैं। बार बार कितनी ही यादें कौंध जाती। तीन साल पहले गजरा लेने दिल्ली आए थे। कैसे बरवां से लौटते वक़्त बहराइच में डायमंड पर लगी कोई फिल्म देखी थी। वह दिन जब मेट्रो खाली रहा करती थी, चाचा माल रोड पर खड़े हैं, पीछे विश्वविद्यालय सेटशन है। मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई, हमारे वह चाचा जो टीवी के बगैर एक दिन भी गुज़ार नहीं सकते थे, वह कैसे दिल्ली से लाये टेलीविज़न को ठीक करवाए बिना रह गए? उनके अंदर के हमारे चाचा कहाँ चले गए थे? 

हम जब गोण्डा से छोटी लाइन की पैसेंजर पकड़ कर बहराइच रेलवे स्टेशन पर उतरते थे, यही चाचा अपना खड़खड़ा लेकर हमारा इंतज़ार किया करते थे। कैसे टुक टुक करते इक्का चलता रहता था। आज उनकी हालत यह हो गयी कि बिना सहारे एक कदम चलना भी दूभर हो गया। देह इतनी दुर्बल हो गयी, कि वह न चाहते हुए भी दयनीय होते गए। शरीर में ख़ून तो बन नहीं रहा था, चेहरा एकदम काला पड़ता गया। कभी दर्द से इतना कराहते, कोई भी उनके उस दर्द को चाह कर भी कम नहीं कर पाया। एक ऐसा भी समय आया, जब वह अपनी नित्य क्रियाओं पर नियंत्रण खोने लगे। कभी कोई उन्हें उठाने वाला नहीं होता, तब भी बिस्तर खराब हो जाता। हमें देखा, इससे बचने के लिए उन्होंने एक रास्ता निकाला। वह अपने तकिये के नीचे काले रंग की थैलियाँ रखने लगे। इससे ज़्यादा ख़राब और नहीं लिख सकता। हमने अपने नानी को अपनी आँखों के सामने मरते हुए देखा है। एक पल पहले वह थीं और एक पल बाद वह नहीं थीं । लेकिन चाचा का इस कदर एक पल में कितनी ही मर्तबा मरते रहना देखा नहीं जाता। 
दो महीने पहले, फरवरी की बारह तारीख़ को सीमा की शादी थी। सबकी यही एक कामना थी। किसी तरह शादी ठीक से हो जाये। कोई अनिष्ट न हो। हम सपरिवार वहाँ थे। मैं कुछ पहले पहुँच गया था। चाचा इस शादी की तय्यारी को बैठे बैठे देखते रहना चाहते थे। लेकिन बहराइच में हुए ऑपरेशन के बाद उनका सीधे बैठना दुश्वार हो गया। वह अब ऐसी हालत में थे, जहां वह अपने संपर्कों का किसी भी तरह कोई उपयोग नहीं कर सकते थे। उनकी किसी भी राय का क्या हो रहा है, इसे जाँचने का कोई तरीका उनके पास नहीं बचा था। वह चुपचाप बिना कुछ कहे सब देख रहे थे। हममें इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उनके पास कुछ देर बैठकर बात कर लिया करते। इस बीमारी ने उन्हें सिकोड़ दिया था। एक बहुत हल्के कंबल को ओढ़े वह सारा दिन दुआरे चारपाई पर लेटे रहते। भारी रज़ाई में दम घुटने लगता और उसे हटाने की ताकत तक अब नहीं रह पाई थी। फ़िर कमरे में कहाँ अकेले पड़े रहते, यही सोच कितनी भी ठंड हो वह वहाँ से हटे नहीं । 

शादी बरसात के बावजूद ठीक से हो गयी। हम उसके चार दिन बाद सोलह को चलकर सत्रह को दिल्ली आ गए। ठीक  हफ़्ते भर बाद भोला मामा का फ़ोन आया। शुक्रवार की रात थी। पापा सो गए थे। साढ़े ग्यारह बज रहे होंगे। मामा बोले, जीजा का बोल बंद हो गया है। सांस उल्टी चलने लगी है। चले आओ। एक धागा, जो हमारे बचपन से आज तक हमें जोड़ रहा था, वह चिटकने वाला है, यह बहुत पास से हम देख आए थे। चाचा ने जीने की अपनी सारी इच्छा सिर्फ़ सीमा की शादी तक रोक रखी थी। वह भी किसी तरह उस दिन तक अपने को जिंदा रखना चाहते होंगे। यह ठान लेने के बाद आदमी हमारे चाचा की तरह हो जाता है। इस ज़िंदगी की उम्मीद को धूमिल पड़ता देख, वह ओझल हो जाना चाहते होंगे। कैसे भी करके इस दुख, असहायता, दुर्बलता के दिनों से भाग जाना चाहते होंगे। कितने ही सपने उन्होंने देखे होंगे और वह ऐसे ही अधूरे रह गए होंगे। दो दिन बाद इतवार आया। रात के साढ़े बारह बजे फ़ोन की घंटी बजी। चाचा अब नहीं थे। 

मेरे मन में वह अंतिम दृश्य बार बार कौंध जाता है, जब हम शादी के बाद दिल्ली के लिए लौट रहे थे और उन्होंने छोटी बहन को पूछा और उसे पास बुलाकर बिदाई के स्वरूप कुछ रुपये दिये होंगे। हम वहाँ से अभी चले भी नहीं हैं, कि वह चारपाई पर लेटे लेटे दूसरी तरफ़ मुँह फेर लेते हैं। शायद उन्हें आभास हो गया था, अब वह हम सबको अपनी बची ज़िंदगी में दोबारा कभी नहीं देख पाएंगे। उनका यह दुख इसी तरह व्यक्त कर सकता था। वह हमारी किन यादों में डूब गए होंगे, कह नहीं सकता। पर हमारे हिस्से के गाँव में चाचा एक ऐसे पात्र थे, जिनके न होने से वह जगह हमेशा के लिए खाली हो गयी, जो सिर्फ़ उनके होने से भरी हुई थी। हमारी कल्पना में वह चाचा का घर चाचा के न होने के बाद कैसे हो गया होगा, सोच भी नहीं पा रहा। चाचा क्यों हमारे इतने पास थे, इसकी कोई ठोस वजह नहीं है, जिसे अभी तक न कहा हो। 
  
(क्रमशः)