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Monday, June 29, 2020

#२# विश्वविद्यालय के दिन: पद्माकर द्विवेदी

धागा मोह का
भाग- २ 

कश्मीर 

.. लड़की कश्मीर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) की स्टूडेंट थी। एनआईटी और कश्मीर यूनिवर्सिटी के कैम्पस लगभग आमने-सामने ही थे। इसलिए दोनों ही इंस्टीट्यूट्स के स्टूडेंट्स एक ही साथ आए थे चैंपियनशिप में। लड़की कम्युनिकेशन साइंसेज में ग्रेज्यूएशन कर रही थी। इस दिसंबर के बाद बस एक ही सेमेस्टर बचा था उसका। फिर तो अगले कन्वोकेशन में फाइनल डिग्री मिल जानी थी उसे। उसकी उम्मीदों की डिग्री। .......उसने लड़के को बताया था कि चेनाब गर्ल्स हॉस्टल के साउथ विंग में फर्स्ट फ्लोर पर उसका कमरा था। जिसकी बॉलकनी श्रीनगर के खूबसूरत डल झील के आगे खुलती थी। लड़की अक्सर एक हाथ में कश्मीरी कहवे का प्याला और दूसरे हाथ में कोई क़िताब लेकर उसी बालकनी में घण्टों बैठी रहती। वह डल झील में मंथर गति से चलते शिकारे को देखा करती और उन प्रेमी जोड़ों को भी जो अपनी नई-शादियों के बाद अपने मधु-उत्सव के लिए यहां आया करते थे। वह दूर बैठकर उनकी उमंगों को साफ़ पढ़ सकती थी। जब कभी पश्चिम में डल झील के पानी में सूरज डूबता तो कई बार उसका दिल भी उसके साथ डूब जाता। उसके अपने कैंपस में ही चिनार के सैकड़ों दरख़्त थे। सर्दियों में जब सारे पत्ते झर जाते थे तो लड़की को उन सूखे पत्तों पर चलना बहुत पसंद था। उसने कहा था-"ये पत्ते एक दिन मिट्टी हो जाएंगे और किसी बारिश में यही पत्ते मिट्टी बनकर कभी झील में घुल जाएंगे। जैसे हमारी स्मृति एक वक़्त के बाद सोग बनकर हमारे ही भीतर घुल जाती है। उसने बहुत अधिक तो नहीं बताया था अपने बारे में पर लड़के को अहसास था कि कुछ तो ख़ालीपन रहा होगा उसकी ज़िंदगी में।

लड़की साइंस की स्टूडेंट थी पर उसे म्यूज़िक,कविता और ओरेशन में भी इंटरेस्ट था। उस रोज़ पीले कमीज़ और सलवार में वो लड़के को ऐसे लग रही थी जैसे पंजाब के ही किसी गाँव की तलहटी में किसी खेत में खिला हुआ सूरजमुखी का फूल। उसे लगता जैसे लड़की की धनुषाकार पलकों में चाँद ने अपने सारे अमावस छुपा रखे हों। उसके खुले हुए गेसू जैसे घटाओं से मिलकर बारिश की साज़िश रच रहें हों। उसे कश्मीरी शायर आगा हस्र कश्मीरी का वो कहा हमख्याल हो आया कि "ये खुले-खुले से गेसू इन्हें लाख तू सँवारे। काश ये मेरे हाथ से संवरते तो कुछ और बात होती।" लड़की ने पतले स्ट्रिप वाले फ्लैटन हील की ब्लैक कश्मीरी सैंडल पहन रखी थी। गोया कोई गिलहरी उसके पाँवों से लिपट कर अठखेलियाँ कर रही हो। उसके कर्ण-पटों पर लटकते हुए वर्तुल ईयर रिंग्स ऐसे थे जैसे उसने अपने कानों से समूचा ग्लोब ही उठा रखा हो। उसके गालों के डिम्पल प्रीति जिंटा से भी खूबसूरत लगे थे उसे । लड़के ने उस क्षण अपने भीतर एक गहरे "काश" को महसूस किया ..! उसने यह भी अहसास किया कि उसने आज तक ख़ुद को किसी के #मोह में इतना बंधा महसूस नहीं किया था। मोह के उस धागे ने उसके समूचे अस्तित्व को बाँध लिया था। वह एक गहरे मोहपाश में उतर चुका था। जिससे बाहर निकलना उससे अब सम्भव न था। यूनिवर्सिटी में बहुत लड़कियां उसकी दोस्त थीं। बराबरी के बहुत सारे रिश्ते थे । पर उसका ऐसे अहसास से गुज़रना पहली बार हो रहा था। उसने देखा कितनी ही लड़कियों के बीच वह अकेली ही ऐसी लड़की थी जिसने कोई मेक-अप नहीं किया था। साधारण का ऐसा असाधारण उसने अब तक न देखा था। उसने उसे जब भी देखा हमेशा सबसे अलग और एकांत में ही बैठे देखा। इन सबसे ज़्यादा उसको सम्मोहन था उसकी निर्दोष- चपल -मुस्कान का। एक बच्चों सी मासूम हँसी हर वक़्त उसके चेहरे पर तैरती रहती थी। वह लड़की की इस सादगी के आकर्षण से खुद को बचा न सका।

उसे अहसास हो गया था कि शायद वह प्यार में है..!!

लड़के ने गेस्ट हाउस के बूथ से दिल्ली में होस्टल के अपने दोस्त को फ़ोन किया। वह अपनी खुशी और भावनाओं का इजहार करना चाहता था। उधर दोस्त को उम्मीद थी कि लड़का कॉम्पीटिशन के बारे में अपनी तैयारी को लेकर बात करेगा। लड़के ने छूटते ही कहा। यार पार्टनर.! मुझे लगता है.. मैं प्यार में हूँ। दोस्त हँसते-हँसते पीसीओ बूथ पर ही लगभग ढह गया। होस्टल में दोस्त ऐसे ही होते हैं। ख़ासकर ऐसे मामलों में। दोस्त ने कहा-"तुम और प्यार।" असंभव..! उसने लड़के से पूछा- आर यू सीरियस। लड़के ने जवाब दिया -" आय अम डैम सीरियस यू फकिंग। तुम्हें आज तक कभी मेरी किसी बात का यकीन हुआ है?" लड़के को नाराज देखकर दोस्त ने अपने को रोककर थोड़ी गम्भीरता से कहा-"सॉरी दोस्त। मैं तो यूँही मज़ाक कर रहा था।" बोलो क्या कह रहे थे ? लड़के ने कहा-" कुछ नही। गो टू हेल एंड जस्ट यूज योर फकिंग हैंड्स।" यह कहकर उसने फोन काट दिया था। उसे दोस्त का मज़ाक करना नागवार गुजरा था। उसने बूथ वाले को पैसे दिए और उखड़े हुए मूड के साथ अपने कमरे पर वापस आ गया।

सुबह के आठ बज रहे थे। दो घण्टे बाद दस बजे तक सारे प्रतिभागियों को डिबेट का विषय दे दिया जाएगा। फिर अगले दिन औपचारिक रूप से दस बजे से शुरू होगी वह सातवीं अखिल भारतीय वक्तृत्व स्पर्धा। वह चैंपियनशिप जिसका उद्घाटन पंजाब के गवर्नर करने वाले थे और जिसमें उन सारे स्टूडेंट्स में से किसी एक को चमचमाती ट्रॉफ़ी मिलनी थी, और साथ में 1 लाख रुपए का कैश प्राइज़ भी। लड़के ही क्या प्रतिभागियों के लिए भी इसका आकर्षण कम न था।
लड़के के पास कुल जमा लगभग 24 घण्टे थे और उसे प्रेम और स्पर्धा दोनों की परिणति तक जाना था। लड़के को एक आग के दरिया में डूब कर जाना था ...🍁🍁🍁

(क्रमशः)

#१ # विश्वविद्यालय के दिन: अर्चना मिश्रा

#विश्वविद्यालय के दिन


 अर्चना मिश्रा 
ये उन दिनों की बात है यानि सन् 1990 की ,इसी वर्ष मैंने इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। परीक्षा समाप्त होने के साथ-साथ मन में ढेर सारे ख्वाब और उत्साह कि अब स्कूल से छुट्टी मिल जायेगी और हमारा अगला पड़ाव कालेज होगा ,कालेज जाने की खुशी इस बात से थी कि  हम अब बड़ी क्लास में प्रवेश ले रहे हैं और दूसरी सबसे बड़ी खुशी यह  थी कि यूनिफार्म से भी छुट्टी मिल जायेगी। थोड़ी जिज्ञासा फिल्मों के कालेज जीवन को देख कर भी थी कि क्या सच में कालेज का जीवन ऐसा ही होता है। मैं भी पूरे जोश, उत्साह, जिज्ञासा, और लगन के साथ कालेज जाने की प्रतीक्षा करने लगी।
 
आज कल, बच्चे स्वयं इंटरनेट पर सारी जानकारी इकट्ठी कर लेते हैं और उनकी इच्छा के अनुसार विषय वगैरह चुनने की हम उन्हें पूरी आजादी दे देते हैं। लेकिन हमारे समय में ऐसा नहीं था , रिजल्ट निकलने के बाद क‌ई लोगों की राय ली जाती थी कि किस कालेज में दाखिला दिलवाया जाए तथा कौन से विषय लिए जाएं , उसके बाद जो निष्कर्ष निकलता था लगभग उसी पर अमल किया जाता था । ठीक ऐसे ही इंटरमीडिएट परीक्षा का परिणाम घोषित होने के बाद विचार विमर्श शुरू हुआ और निष्कर्ष यह निकला कि मेरा दाखिला विश्व विद्यालय में करवाया जायेगा यदि लिस्ट में नाम नहीं निकला तब दूसरे विकल्प पर विचार किया जाएगा इसके पीछे एक तर्क यह मिला कि एक कपड़ा यदि गोलघर की किसी दुकान से खरीदा जाता है और दूसरा कपड़ा किसी छोटी दुकान से लिया जाता है तो दोनों में गोलघर वाली वस्तु का महत्व अधिक होगा क्योंकि यह स्टैंडर्ड का विषय है। खैर ...प्रवेश फार्म भरने के पश्चात् लिस्ट में नाम आ गया और मेरा दाखिला गोरखपुर विश्वविद्यालय में हो गया । स्नातक में हिंदी, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र विषय में प्रवेश के लिए मैंने आवेदन किया था लेकिन मुझे अर्थशास्त्र की जगह संस्कृत विषय मिला लेकिन मैंने दौड़ भाग करके पुनः अर्थशास्त्र विषय में अपना एडमिशन ले लिया। हालांकि परास्नातक( हिंदी) के उपरांत मैंने केवल संस्कृत विषय (एक विषय)लेकर पुनः स्नातक किया लेकिन उस समय दिमाग में पता नहीं क्या फितूर सवार था कि संस्कृत विषय मिलने के बाद भी मैंने उसे छोड़ दिया। 

खैर, बड़े उत्साह के साथ विश्वविद्यालय में जाना शुरू हुआ ,गुरुजन कक्षा में नियमित रूप से अध्यापन के लिए आते थे ये अलग बात थी कि कुछ शिष्याएं केवल पढ़ने विश्वविद्यालय नहीं आती थीं उन्हें और भी कई महत्वपूर्ण कार्य होते थे जो वह विश्वविद्यालय आने के बहाने उसे संपादित किया करती थीं,वह उनका व्यक्तिगत मामला था । हिंदी विभाग से डॉ के सी लाल, डॉ सुरेंद्र दुबे, डॉ अनिल राय, डॉ मंजू त्रिपाठी, डॉ राम दरश राय, डॉ गणेश पाण्डेय, डॉ जनार्दन, डॉ चितरंजन मिश्र, पूर्णिमा सत्यदेव  गुरुजनवृंद से ज्ञान प्राप्त करने का सौभाग्य मुझे मिला ।
      मनोविज्ञान विभाग में डॉ अचलनंदिनी श्रीवास्तव , डॉ सुषमा पांडेय, डॉ बब्बन मिश्र, अशोक सक्सेना, डॉ नरेन्द्र मणि, गुरूजन से शिक्षा प्राप्त हुई । अर्थशास्त्र में डा संदीप दीक्षित सर , डॉ योगेश सिंह ,यादव सर यामिनी जोशी मैम से शिक्षा ग्रहण करने का मुझे सौभाग्य मिला है । यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे जिन सम्मानित गुरुजी लोगों से शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला वह अपने विषय में अथाह ज्ञान के सागर थे जो  नियमित रूप से अध्यापन कार्य करने वाले और धाराप्रवाह रुप से अपने विषय में व्याख्यान देने वाले थे जिन्हें बस, केवल सुनते रहिए।
गोरखपुर विश्वविद्यालय का प्रवेशद्वार 

    हालांकि विश्वविद्यालय में जब मेरा एडमिशन हुआ तो अनुशासन का पूरी तरह से अभाव था l गुरुजन अपने पूरे जोश के साथ व्यख्यान दे रहे हों तो भी अचानक से भावी नेता बिना किसी हिचक के सीधे कक्ष में प्रवेश करके व्यवधान डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते थे । चुनाव के दौरान यह बहुत खटकता था क्योंकि पठन-पाठन का आधा भाग ,बारी -बारी आने वाले नेता जी नष्ट कर देते थे।हमारी कक्षाएं परीक्षा भवन में चलती थीं उसके बाहर अति उत्साही स्वघोषित भद्र पुरुष किसी की प्रतीक्षा में सदैव उपस्थित रहते थे । 

कुछ समय उपरांत प्रोफेसर विश्वंभर शरण पाठक महोदय ने विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में कार्यभार ग्रहण किया और  अनुशासन  का कठोरता से पालन करवाने की कोशिश शुरू की तत्पश्चात् विश्वविद्यालय के शैक्षिक वातावरण  में कुछ  सुधार हुआ । मैं यह नहीं बताऊंगी कि पाठक सर के पहले कुलपति के रूप में कौन विराजमान था या थीं।  

(क्रमशः)

Sunday, June 28, 2020

#१ # विश्वविद्यालय के दिन: पद्माकर द्विवेदी

धागा मोह का

पद्माकर द्विवेदी 
इसके पहले वह कभी चंडीगढ़ नहीं गया था।
पर अब जा रहा था। दिल्ली में यूनिवर्सिटी के वो उसके आख़िरी साल थे। दिसंबर की सर्दियों में उसकी यूनिवर्सिटी के डिबेटिंग क्लब ने उसे पंजाब यूनिवर्सिटी में होने वाले नेशनल डिबेट चैंपियनशिप में यूनिवर्सिटी को रिप्रेजेंट करने के लिए चुना था। लड़के को तय करना था कि वह या तो हॉस्टल में रहकर महीने के आख़िर में पड़ने वाले अपने जेआरएफ के एक्ज़ाम की तैयारी करे या फिर वो अपना बैक -पैक तैयार करे और कुछ ज़रूरी किताबें लेकर चंडीगढ़ के लिए निकल पड़े। पर आदतन उसने दूसरा विकल्प चुनना ही मुनासिब समझा। लड़के ने उसी दिन डीन ऑफ स्टूडेंट्स वेलफेयर ऑफिस जाकर एडवांस लिए और 14095 अप 'हिमालयन क्वीन' की सेकेंड एसी की टिकट करा ली। होस्टल के पीसीओ बूथ पर एक रुपए का सिक्का डाला और घर पर बता दिया कि वो जा रहा है- चंडीगढ़। वैसे भी उसे सिर्फ बताना ही तो होता था हर चीज़। वो सुनता किसकी था?

दरअसल कॉलेज के दिनों से ही डिबेट लड़के का पैशन था। उसे बोलना पसंद था। बचपन से ही इंट्रोवर्ट रहे इस लड़के की यही एक चीज़ थी जो उसे औरों से जुड़ने में मदद करती थी। गोया अपने ज़िंदगी की बहुत सारी खाली छूट गई जगहों को वो ऐसे ही बोल-बोल कर भरना चाह रहा हो। पर वह अपने बोलने में औरों को भी सुनना जानता था। उसे मालूम था एक अच्छा लिसनर ही एक अच्छा स्पीकर हो सकता है। उसने कई डिबेट्स कीं थी अब तक जिसमें वह तीन चौथाई से ज़्यादा डिबेट्स जीतने में कामयाब रहा था और पैसे भी ठीक-ठाक जीते रहे होंगे। उसके तर्क अब तक कामयाब रहे थे। इस चैंपियनशिप को इस बार पंजाब यूनिवर्सिटी और मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन मिलकर स्पॉन्सर कर रहे थे। ज़ाहिर है इस बार प्राइज़ मनी भी जबर्दस्त थी। शायद लड़के ने इस वज़ह से भी दूसरा विकल्प चुना था। आख़िर 4 +1 कुल पाँच मिनट बोलकर अगर अच्छे ख़ासे पैसे भी मिल जाएं तो बुरा क्या था? और यूनिवर्सिटी की मुद्रा पर चंडीगढ़ शहर घूमने का लुत्फ़ अलग। मिडिल क्लास लड़के ऐसी ही कैलकुलेशन में जीते थे उन दिनों।
Punjab University 

उसे बचपन से ही स्पर्धाएं पसंद थीं। इन्हीं स्पर्धाओं ने ही उसे महत्वाकांक्षी बनना सिखाया था। वह अक्सर नेपोलियन को उद्धरित करता हुआ कहता था-"जो अकेले चलते हैं वो तेज़ी से आगे बढ़ते हैं।" बचपन से ही घर से बाहर बोर्डिंग और होस्टल की अकेले रहने वाली जिंदगी को जैसे वो इस एक लाइन से जस्टीफाई करता रहा हो। शाम को सारे काम पूरे करके हॉस्टल से 894 नम्बर की बस लेकर वह सीधा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचा। उसका दोस्त और रूममेट उसे पहुँचाने आया था। आम दिनों की ही तरह ही राजधानी के सबसे बड़े रेलवे स्टेशन पर वही शोर-शराबा। वही चहल-पहल। ट्रेन के अंदर आकर उसने अपनी सीट ली। दोस्त ने गले लगाया और जीतने की शुभकामनाएं दीं। लड़के ने इसके बदले पार्टी का वादा किया। दोस्त के जाने पर उसने कुछ देर तक गाँधी के हिन्द स्वराज्य व माल्थस और एडम स्मिथ की थ्योरीज़ पढ़ीं। क्या पता डिबेट में कुछ मदद मिल जाए। फिर कुछ देर बाद बत्ती बुझाई। किताब रखा और सो गया।

लड़का तीन साल से दिल्ली में यूनिवर्सिटी के अपने होस्टल में रह रहा था। यूपी के अपेक्षाकृत छोटे से शहर का वह लड़का जिसे दिल्ली ने इन सालों में बहुत कुछ बदला था। पर बहुत कुछ ऐसा भी था जिसे शायद अब भी नहीं बदला जा सका था। यही कुछ गढ़ा- अनगढ़ा ही मिलकर उसे बनाते थे। वह गम्भीर भी था और चंचल भी। विनम्र भी था उद्दंड भी। भावुक भी ज़िद्दी भी। वह एक साथ सबकुछ था। अच्छाई और बुराई का परफेक्ट कॉकटेल। प्रीवियस ईयर में वह टॉप कर चुका था। इस साल भी गोल्ड मेडल के सबसे नज़दीक था। उसके दोस्त ने आगाह भी किया कि भाई थोड़ा और मेहनत कर लो। मेरे जैसे फर्स्ट डिवीजनर बहुत होते हैं पर गोल्ड मेडलिस्ट एक ही होता है। थोड़ा कंसन्ट्रेट कर लोगे तो यह तमगा ज़िंदगी भर के लिए तुम्हारे साथ होगा। क़िस्मत अच्छी रही तो वाइस चांसलर मेडल भी तुमसे बहुत दूर नहीं है। और फिर तुम्हारे जेआरएफ एक्जाम सर पर हैं। क्या तुम्हें अब फैलोशिप की चाहत नहीं रही? लड़के ने दोस्त की चपत ली और समझाया - "मेरे यार तुम्हारी मोहब्बत सर आँखों पर।" लेकिन प्रीवियस ईयर में भी आख़िर मैंने यह सब करते हुए ही मार्क्स लाए हैं। अभी तो समेस्टर ख़त्म ही हुआ है। काफी वक़्त है फाइनल एक्ज़ाम के लिए। और फिर जिस वाइस चांसलर मेडल के लिए तुम मुझे सदाएं दे रहे हो उसके लिए ओवर ऑल परफॉर्मेंस ज़रूरी है। ऐसा समझो कि यह डिबेट भी इसी का हिस्सा है। और फैलोशिप तो इस बार मैं ले ही लूँगा।दरअसल लड़के में आत्मविश्वास बहुत था। यही उसकी अच्छाई भी थी और कमी भी। पूर्वांचल के लड़कों में ओवर कॉन्फिडेंस एक कॉमन इंग्रेडिएंट्स है। यह कोई नई चीज़ नहीं थी।

ख़ैर। ट्रेन रुकी तब तलक सुबह हो चुकी थी । लड़के ने आँखे खोलीं तो खिड़की से स्टेशन पर पीले पट्ट पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा देखा- चंडीगढ़! समुद्र तल से ऊँचाई 330 मीटर। वह पहली बार पंजाब की धरती पर आया था। उसने महसूस किया कि पंजाबी बहुत अच्छे होस्ट होते हैं। और खुश मिज़ाज भी।स्टेशन पर निकलते ही पंजाब यूनिवर्सिटी का स्वागत काउंटर था। पंजाबी परिधान में एक खूबसूरत लड़की ने रैप्ड पेपर में आधा रैप किया हुआ लाल गुलाब का फूल देकर उसका स्वागत किया। लड़का मुस्कुराया और अभिवादन का प्रत्युत्तर अभिवादन से दिया। सामने ही वॉल्वो खड़ी थी। देश के अलग-अलग यूनिवर्सिटी से काफी प्रतिभागी आ रहे थे। जो आ चुके थे उन्हें इसी बस में बैठकर यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस जाना था। लड़का भी इसी बस में जाकर बैठ गया। ज्योहीं ड्राइवर ने दलेर मेहंदी के पंजाबी गानों का बैस बढ़ाया सबके चेहरों पर खुशी उछल सी गई। बस में बैठे सारे लड़के -लड़कियां जो आज यहां हैं कल को न जाने कहाँ होंगे अपनी-अपनी जिंदग़ियों में। ऐसा लड़के ने सोचा। सबके अपने संघर्ष होंगे। सबकी अपनी दुश्वारियां होंगी। सबके अपने जद्दोजहद होंगे। वह महसूस कर पा रहा था कि वह अपनी ज़िंदगी के उस मिडवे से गुज़र रहा है जहां ये वक्त दुबारा नहीं आने वाला था। कोई यू टर्न नहीं था वहां। उसे रंग दे बसंती का वह संवाद याद आया जिसमें आमिर ख़ान का क़िरदार कहता है-" जब तक हम कैम्पस में होते हैं, हम दुनिया को नचाते हैं। एक बार कैम्पस से बाहर आ जाने पर वही दुनिया हमें नचाती है।"

कुछ ही देर बाद बस रुकी। और उसके ख़्याल भी। पंजाब यूनिवर्सिटी का शानदार कैम्पस। कैम्पस की सड़कें ऐसीं कि फेरारी दौड़ जाए। नवीन स्थापत्य से बनी यह वही यूनिवर्सिटी थी जहां प्राइमिनिस्टर मनमोहन सिंह स्टूडेंट रहे थे। जगजीत सिंह ने तरुणाई में यहां कितनी गजलें सुनाई होंगी अपने दोस्तों को। और फिर अनुपम खेर जो हिमाचल से अपने घर से पैसे चुराकर यहां आ गए थे एक्टिंग सीखने के लिए। परिसर नाम के ही मुताबिक ऊर्जा से भरा हुआ था। कैम्पस में ही चंडीगढ़ मेडिकल कॉलेज के सामने ही यूनिवर्सिटी का गेस्ट हाउस था। बस रुकी तो बस से उतरते ही पीछे से एक मद्धम सी आवाज़ आई। एक्सक्यूज़ मी.! लड़के ने मुड़कर देखा। एक पार्टिसिपेंट लड़की ने बहुत ही विनम्र स्वर में कहा - यह बुक शायद आपकी है। सीट पर रह गई थी। लड़के ने थोड़ा असहज होकर कहा। "ओ हाँ..। थैंक्स । मेरी ही बुक है। मैं अक़्सर अपनी चीजें भूल जाया करता हूँ। शुक्रिया आपका.!" बात -चीत में लड़का -लड़की बस से उतरकर थोड़ी दूर आ गए। ठंड बहुत थी सो लड़के ने जल्द ही विदा ली और शुक्रिया कहकर आगे बढ़ गया।

लड़के ने गेस्ट हाउस के काउंटर पर अपने नाम के आगे साइन किया। चाभी ली और कमरे पर जाकर एक बार फिर से सो गया। सोना जैसे होस्टल में रहने वालों का राष्ट्रीय शगल हो। हाउस कीपिंग असिस्टेंट ने दरवाज़े और फर्श के बीच नीचे से उसके कमरे में अख़बार सरका दिए थे। उसे ब्रेक फास्ट के लिए कॉल दी गई फिर भी वह सोया ही रहा। दोपहर तक सोता ही रहा वो। फिर लंच के ठीक पहले जागा। आँखे मीचकर उसने खिड़की से पर्दा सरकाया तो उसे वही लड़की दिखाई दी जिससे सुबह उसकी मुलाकात हुई थी और बातचीत में तीन बार उसने उसे शुक्रिया कह डाला था।

Guest House
वह मन ही मन मुस्कुराया। दिन बहुत ख़ुशगवार था आज। धूप निकल चुकी थी। मौसम में सर्दी कम हो चली थी। बाहर कैंपस में खिले हुए फूल एक अलग ही छटा का निर्माण कर रहे थे। बालकनी से आकर उसने कॉफी का मग टेबल पर रखा और डायरी के कुछ पन्ने भरे। अब उसे इंतज़ार था तो उस मौके के लिए जिसके लिए वह यहां तक आया था। पर उसे क्या मालूम था कि आगे उसे एक साथ दो-दो स्पर्धाओं में होना है। जीवन में ऐसे ही बहुत कुछ होता है। एकदम अचानक और अप्रत्याशित..! बिना किसी आहट और पूर्व सूचना के। बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के। वह आने वाले पलों से बेख़बर था।

लड़के को प्रेम में होना था...!

(#क्रमशः)


पद्माकर द्विवेदी 
सम्प्रति, भारतीय रिज़र्व बैंक की क्लास-I सर्विसेज के अंतर्गत 
मुंबई स्थित केंद्रीय कार्यालय में अधिकारी (बैंकिंग विनियमन) 
के रूप में पदस्थ हैं ।