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Monday, December 31, 2018

कहानी- दरोगा सिंह की मौत: अनुराग अनंत

 दरोगा सिंह की मौत

साल का आखरी दिन, साल एक संख्या। अंकों का बदल जाना। एक कैलेंडर की जगह दूसरे कैलेंडर का दीवार पर लटकना। और कुछ रेतीले संकल्पों का टूटने के लिए बनना। एक दुहराव का मामूली झड़प के बाद फिर हावी हो जाना। डायरियों के चंद पन्नो का रंगा जाना और फिर उन्हीं पन्नों से मुंह चुराना। बड़ी पुरानी क्रिया रही जिसे दोहराते हुए उसने अपने जीवन के 35 बसन्तों में से 16 में यही क्रम जारी रखा था।

वो आदमी बनना चाहता था। इसलिए उसने पढ़ाई की। नौकरी नहीं मिली तो दुनिया ने फिर चीख कर कहा "ये आदमी नहीं है"। उसकी हथेली रह रह कर पठार की तरह पसर जाती थी। लोग उसमें अपनी हिक़ारत बो देते थे। वो उस हिक़ारत की फसल को अपने दिमाग के एक अंधेरे कमरे में इक्कट्ठा करता जाता था और मज़बूरी के दिनों में मौत को टालने के लिए उन्हीं से अपना पेट भर लिया करता था।

वो सपना अब भी देखता था पर सपने से जागते ही चीखता था और फिर अगली दो रातें किताबें पढ़ते हुए या गाने सुनते हुए बिताता था। उसकी जाति क्या थी वो नहीं बताता था। अपने बारे में जब कुछ बताने पर आता तो बस इतना कहता की जब वो आठ साल का था तो उसकी माँ मर गयी और पिता उसके जीवन मे प्राकृतिक बाध्यता और समय के संयोग की देन थे सो जब तक रहे तब तक रहे फिर जब नहीं रहना था, कहाँ गए पता नहीं चला। एक झिलमिल झिलमिल सी लड़की उसकी बातों में चमकती थी, जिसका सुराग़ मिलता था। पर वो कभी नहीं मिलती थी। उसके बारे में पूछने पर वो ऐसे मुस्काता था। जैसे रोने को टालने के लिए मुस्काया हो। वो कहाँ से आया है? के जवाब में अरस्तू की तरह दार्शनिक हो जाता था और बात कुंडली मार कर बैठ जाती थी। तो वो लड़का हमारे मुहल्ले में किराए के मकान में रहता था। राजेंदर नाम था उसका। पहले विश्वविद्यालय में पढ़ता था। फिर क्या करने लगा पता नहीं पर कोई नौकरी जैसा नहीं था। क्योंकि वो कभी कमरे से निकलता, कभी कमरे पर ही रह जाता। ग़ायब रहता तो महीने, दो महीने, छ: महीने बाद आता। मेरे लिए वो एक पहेली थी। जो उस लड़के की शक़्ल में हमारे मुहल्ले में रहती थी। एक चुम्बक। एक हीरे जैसा कुछ। मुझे हमेशा आकर्षित करता रहता था वो।

एक दिन चाय पीते हुए चौराहे पर मैंने उससे पूछा तुममें इतना आकर्षण क्यों है? वो हंसा और बोला एक दिन पता चल जाएगा। और जब तक नहीं पता चलता इतना जानों की मैं एक खतरों से घिरा, भटका हुआ आदमी हूँ। इसीलिए शायद आकर्षक हूँ। भटकाव में बहुत आकर्षण होता है। और फिर एक शाम जब उसने पहलवान दरोगा सिंह को गोली मारी थी उससे एक हफ्ते पहले मुझसे गंगा के किनारे मिला और गले लग कर रोने लगा। मैं अपनी नींव की मिट्टी का खिसकना महसूस करता रहा। वो उसदिन सिर्फ बोलना चाहता था। मैने उसे चुप करना चाहा तो उसने मुझे चुप करा दिया। वो अंधड़ की तरह उमड़ रहा था। 25 दिसंबर का दिन था। और एक हफ़्ते बाद उसे जेल में होना था।

Family Dynamics by Naomi Gerrard 


उसने बताया कि उसके बाप ने एक रखैल रखी थी। और उसे उस रखैल की बेटी से प्यार हो गया था। एक पतित रिश्ता कहा जायेगा ये? पर उसके पिता ही उस लड़की के बाप हैं इसकी क्या गारंटी थी। उसने उस लड़की से जी निचोड़ कर प्यार किया। और उस लड़की ने उससे जी उड़ेल कर । उसके बाप ने एक रात लड़की को मार डाला और अगली सुबह उसने अपने बाप को और भाग कर यहां आ गया। उसके दिमाग़ में जैसे तब से आंधी चलती रही। एक चक्रवात सा। पढ़ाई लिखाई करके इसके उस पार निकलने की सारी जुगत खाईं में कूदती गयी और वो ना चाहते हुए वही रहा जिसे वो बदलना चाहता था। उसने कहा उसे जेल में होना चाहिए था। और वो जेल जा कर रहेगा। पर इस बार भी वो अपने बाप जैसे किसी को मारना चाहता है।

उसने मेरे सामने दोनों हाँथ जोड़े और घुटनों के बल जमीन में धंस गया। मुझे बहुत दया आयी और मैंने कहा- "दरोगा सिंह"। दरोगा सिंह हमारे शहर का सबसे रसूखदार ठेकेदार। मालादेवी उसकी रखैल और उसकी बेटी स्वाति, मेरी जिंदगी। और दरोगा सिंह की शिकार। वो श्वाती को अपना स्वाद बदलने के लिए चख लेता था। माँ उसकी रखैल है और उसकी बेटी स्वाति उसकी कैदी। बेहद प्यार करता हूँ मैं स्वाति से। वो मेरी बाहों में गीली रेत सी पसर जाती है। मैं हत्या करने की योजना बनाता हूँ। और स्वाति से महीनों आंख नहीं मिला पाता। मैं स्वाति, मालादेवी, और दरोगा सिंह का नाम लेता लेता रोता रहा और राजेंदर मेरी आंखों से ओझल हो चुका था।

उसने दरोगा सिंह का नाम अपनी डायरी में लिखा और संकल्प के खांचे में उसकी मौत लिख दी। 31 दिसबंर की शाम जब दरोगा सिंह मॉडल शाप में दारू पी रहे थे। उसने अपने भीतर की जड़ता को तोड़ा और एक अटके हुए प्रतीक्षारत दुहराव को पुनः घटित हो जाने दिया। उसके कट्टे से गोली निकली और दरोगा सिंह तड़पने लगा। वो सिर ऊपर किये हुए शिल्पी शिल्पी खीखता रहा। पूरा शहर शिल्पी कौन है? एक दूसरे से पूछता रहा और उसने रात दो बजे थाने में गिरफ्तारी दे दी। उसने मुझे जो अपनी डायरी दी थी उसमें मैंने आख़री वाक्य पढ़ा। "इस बार मैं अपना साल बर्बाद नहीं जाने दूंगा"।

इन सबके बीच मैंने ना उससे बताया कि स्वाति दरोगा सिंह की लड़की थी और ना स्वाति को बताया कि मैंने ही उसके बाप को मरवाया था क्योंकि उसके रहते मेरी और उसकी शादी नहीं हो सकती थी। मैं इस साल स्वाति से शादी कर लूंगा।








उबलते आत्मविश्वास के माटी से जुड़े युवा कलमकार

Sunday, December 30, 2018

#४# विश्वविद्यालय के दिन: अंजनी कुमार पांडेय

यूंइग क्रिश्चियन कालेज ( ईसीसी)

समय की रफ्तार का पता ही नही चलता , दिसंबर का आख़िरी दिन आ गया , एक और साल बीतने को है। बीतते साल के साथ जिेंदगी भी लगता है भाग रही है । हमें लगता है अभी बहुत समय है पर ऐसे ही जिंदगी बीत जाती है। इंसान केवल देख सकता है बंद आँखों से , कुछ पल जो अब नही जिये जा सकते , कुछ लोग जो अब नही हैं जीवन मे , कुछ ग़लतियाँ जो नही होनीं थी , और वह बहुत कुछ जो इंसान बदलना चाहता है बीते हुये कल मे । 


बीता कल हमेशा से बेहतरीन लगता है और इंसान हमेशा से बीते कल को दोबारा जीना चाहता है । इन्हीं ख़यालों मे आज फिर से जिंदगी के बीते पलों की किताब खोलने का दिल किया और अनायास ही मै डूब गया उन बीते दिनों मे जो अब बस यादों का रूप लेकर ही वापस आ सकते हैं । शायद अतीत हमेशा सुंदर ही होता है, या कहा जाये कि अतीत हमेशा वर्तमान से बेहतर प्रतीत होता है । इन्ही कशमकश मे डूबा हुआ मै , बीते दिनो को खोजता हुआ , यादों मे गोते लगाता हुआ , निकल पड़ा मै अपने शहर ...इलाहाबाद...। 


मानो कल की ही बात हो जब मैंने यूइंग  क्रिश्चियन कॉलेज मे एडमीशन लिया हो। स्कूल से निकलने के बाद जिस आजादी का अनुभव आप कालेज मे करते हैं, वह अनुभव मुझे यूंइग क्रिश्चियन कालेज मे मिला । ईसीसी के नाम से मशहूर मेरा यह कालेज इलाहाबाद के उन संस्थानो मे से है जो वाकई बेहतर शिक्षा के लिये जाना जाता है। अगर जीवन मे थोड़ा बहुत भी कुछ हासिल किया तो वह इसी स्नातक कॉलेज की देन है । कवि प्रदीप के कालजयी राष्ट्रगीतों को जननी यह कॉलेज हर इक विद्यार्थी के  मस्तिष्क पर एक अमिट छाप छोड़ जाता है , कि उसके बाद वह कहीं भी जाये पढ़ने , याद उसे ईसीसी ही रहता है ।



एक अलग सा आकर्षण है इस कालेज मे , अलग सी बनावट है इसकी, एक अलग सा रोमांच है यहां पढने मे ।  यमुना नदी का किनारा,अंग्रेज़ी  हुकुमत के समय की बनी इमारतें और कालेज के बीचोंबीच खड़ा बरगद का पेड़ जिसकी छांव मे बैठकर बहुत सी क्लासेज बंक की गई, जहां चाय के दौर चलते थे, जहां आजाद हवा थी , जहां आजाद ख्याल थे , जहां क्रांति की बातें भी हुई और जहां प्रेमगीत भी लिखे गये, और जहां देखे अनगिनत लडकों ने एक अच्छे जीवन का सपना ।


ऐसा ही एक अच्छे जीवन का सपना मेरे आजाद मन ने देखा था इस कालेज मे । वो सपना कितना पूरा हुआ यह तो मै नही जानता लेकिन एक बात का सुकून है लेकिन यहां के शिक्षकों  द्वारा दी गई शिक्षा आज भी मुझे रास्ता दिखाती है । आज भी देख सकता हूँ खुद को साइकिल से कॉलेज जाते हुये , आज भी देख सकता हूं खुद को नोट्स बनाते हुये, आज भी देख सकता हूं खुद को रात भर पढते हुये, आज भी याद हैं वह सीढियां जिन्होने मंजिलें दिखाई , आज भी याद हैं वो पाठ जो जीवन के फलसफे बयान करते थे, और आज भी जीवित है वो जिजीविषा जो ईसीसी ने मुझमे जगाई ।  


शायद हर लड़के का कालेज ऐसा ही होता है, शायद हर कालेज यही सिखाता है, शायद हर कॉलेज आपको तराशता है , शायद हर कालेज ईसीसी होता है , बस लोग किसी और नाम से याद करते हैं । 

आज घूम आया मै फिर से अपने कालेज , आज पी आया मै फिर से चाय की एक प्याली, आज सुन आया मै फिर से एक प्रेमगीत, और आज फिर से जी आया मै बीते हुये कुछ साल ...।


कल फिर एक नया साल आयेगा , 

कल फिर लोग ख़ुशियाँ मनायेंगे , 

कल फिर कॉलेज छूटे हुये सालों मे एक साल बढ़ जायेगा ...!!!


शेष फिर कभी...




@अंजनी कुमार पांडेय 

पुराछात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय 

लेखक भारतीय राजस्व सेवा २०१० बैच के अधिकारी हैं और वर्तमान मे प्रतिनियुक्ति पर विदेश मंत्रालय मे रीजनल पासपोर्ट ऑफिसर के पद पर सूरत मे तैनात हैं ।

Thursday, December 20, 2018

#३# विश्वविद्यालय के दिन: अंजनी कुमार पांडेय

नाम इलाहाबाद ...!



समय कभी नहीं रुकता, अपनी गति से भागता रहता है । समस्त बदलावों को आत्मसात करते हुये। इसी भागते निष्ठुर समय के साथ मेरा शहर इलाहाबाद से प्रयागराज बना दिया गया, और देखते ही देखते इस बदलाव को जनता ने स्वीकार भी कर लिया। पता नहीं क्यों मगर मैं इस बदलाव से असहज हूं और भावनात्मक रूप से अपने को इलाहाबाद के समीप ही पाता हूँ । जन्म से लेकर जवानी तक मेरे ग्रामदेवता ने मेरे शहर का नाम मुझे इलाहाबाद ही बताया है। 

तुम हमेशा मेरे लिये इलाहाबाद ही रहोगे ...!

मैं तुम्हारी कल्पना किसी और नाम से कभी भी नहीं कर सकता ....!

चित्र साभार: आउटलूक हिंदी


जब आँख खोली तब अपने आप को फूलपुर, इलाहाबाद में पाया, स्कूल गया नैनी, इलाहाबाद में, ग्रेजुएशन किया जिस कॉलेज से वह था गउघाट इलाहाबाद में, पोस्ट ग्रेजुएशन किया इलाहाबाद विश्वविद्यालय से । दूसरे शहरों के लिये ट्रेन पकड़ी इलाहाबाद रेलवे स्टेशन से, बचपन से लेकर जवानी तक जो भी जिया इलाहाबाद में और जो भी किया इलाहाबाद में। अचानक पता चलता है कि अब जीवन के हर इक पन्ने से इलाहाबाद हटाना पड़ेगा और अब हर जगह इलाहाबाद की जगह प्रयागराज लगाना पड़ेगा । 

पता नहीं मगर क्यों मेरी  पहचान मुझसे छीन ली गई, 

इलाहाबाद शब्द मे मेरी आत्मा बसती रही है हमेशा से, 

काश मै रोक सकता समय के इस खेल को। 


मैं एक हिंदू हूँ और संगम मे लाखों बार डुबकी लगाई होंगी मैंने। हर एक कुंभ मेले में गंगा-यमुना का आशीर्वाद लिया है मैने। ऋषि भारद्वाज के आश्रम मे भी हर महीने दर्शन के लिये जाता रहा हूं। संगम किनारे स्थित लेटे हुये भगवान हनुमान आराध्य हैं मेरे । परंतु अगर मेरी आस्था अगर मेरे धर्म से है तो मेरी आस्था मेरी मिट्टी से भी है। मेरी मिट्टी में अगर पवित्र संगम है जहाँ मैंने अनगिनत डुबकियाँ लगाईं हैं तो मेरी मिट्टी में खुसरो बाग़ भी है जहाँ तमाम शामें मैंने गुज़ारी हैं। मेरी मिट्टी में अगर अलोपी देवी का मंदिर है तो मेरी मिट्टी में ऑल कैथिड्रल गिरिजाघर भी है जिसके मैंने तमाम चक्कर लगाये हैं । मेरी मिट्टी में अगर चंद्रशेखर आज़ाद पार्क है तो मेरी मिट्टी में मिंटो पार्के भी है। मेरे लिये यह सब मिलाकर ही मेरा इलाहाबाद बनता है । 

प्रयागराज नाम में वह बात नहीं जो इलाहाबाद में है क्योंकि अगर प्रयागराज एक धर्म है तो इलाहाबाद एक दर्शन है, और यह दर्शन तमाम धर्मों को समाहित किये है अपने भीतर । प्रयागराज गंगा जमुनी तहज़ीब से डिस्कनेक्टेड है और इसीलिये शायद मुझसे भी । 


तुम हमेशा मेरे लिये इलाहाबाद ही रहोगे ... 

मैं तुम्हारी कल्पना किसी और नाम से कभी भी नहीं कर सकता ...!

जब आँखें खोलीं थी तब तुम इलाहाबाद थे और जब आँखें बंद करूँगा तब भी तुम इलाहाबाद ही रहोगे मेरे लिये। मुझे नहीं पता कि तुम्हारी उत्पत्ति अल्लाह आबाद से हुयी है या फिर इला देवी से, मुझे नहीं पता कि तुम्हारा नाम हिंदू है या मुसलमान । मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि तुम्हारे नाम से मेरे जीवन का हर लम्हा जुड़ा हुआ है,और किसी भी शासक को मेरी यादों से, मेरे जीवन की तमाम स्मृतियों से छेड़छाड़ करने का कोई हक़ नहीं था ।

किसी शासक ने सत्ता के जोश में प्रयाग को अल्लाह आबाद कर दिया था, आज के शासक ने प्रयागराज कर दिया । कल कोई और आयेगा और वह कोई नया नाम दे देगा । कितने नाम बदलेंगे शासक - श्रंगवेरपुरम , प्रयाग, प्रयागराज , कौशांबी , इलाहाबास , इलाहाबाद और ना जाने क्या क्या नाम । हिंदुस्तान के इतने लंबे इतिहास में कितने ही नाम हुये हैं इस शहर के। जिस शासक का जो मन किया उसने वह नाम कर दिया, नहीं सोचा जनता क्या चाहती है , नहीं सोचा जनता की भावनायें क्या है । आज भी वही किया गया है, पाँच सौ साल पहले जो ग़लती हुई थी , उसको दोहरा कर आज के राजा को पता नहीं क्या मिलेगा और पता नहीं कौन सा स्वाभिमान वापस आयेगा । 

कैसा लगेगा अगर कोई किसी का नाम बदल दे , कैसा लगेगा अगर कोई आपकी पहचान बदल दे , कैसा लगेगा अगर रातोंरात कोई आपका इतिहास बदल दे , कोई आपकी तमाम स्मृतियाँ बदल दे । मुझे भी ऐसा लगा है कि मानो किसी ने मेरा पूरा बीता हुआ जीवन बदलने की कोशिश की हो । मुझे पूरी श्रद्धा है प्रयाग नाम से , मुझे अपार प्रेम है हिंदू धर्म से ,पर मेरा शहर मुझे इलाहाबाद के नाम से ही पसंद था और मैं अपने आप को इसी नाम से कनेक्ट कर पाता हूँ ।

यह मेरा इलाहाबाद है ...!

मेरे बचपन का इलाहाबाद , 

मेरी जवानी का इलाहाबाद , 

मेरी हर इक कहानी का इलाहाबाद , 

और 

काग़ज़ पर कोई कुछ भी कर दे ,

मेरे दिल में मेरे शहर का नाम इलाहाबाद ही रहेगा , 

उसे कैसे मिटायेगा दुनिया का कोई भी शासक ....।

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@अंजनी कुमार पांडेय 
पुराछात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय 
लेखक भारतीय राजस्व सेवा २०१० बैच के अधिकारी हैं और वर्तमान मे प्रतिनियुक्ति पर विदेश मंत्रालय मे रीजनल पासपोर्ट ऑफिसर के पद पर सूरत मे तैनात हैं ।