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Saturday, August 3, 2019

हमारी अमरनाथ जी की यात्रा -1

हमारी अमरनाथ जी की यात्रा -1
(श्रीश-खुशबू)



मन में तो कितनी ही लालसाएँ होती हैं l भीतर होती हैं, अलसायी सी l कभी-कभी उनमें पंख लग जाते हैं जब सहसा कोई मजबूत कारण स्वतः ही उपलब्ध हो जाता है l दिल्ली से अपने घर खलीलाबाद (उत्तर प्रदेश) ट्रेन से जाना हो तो होली-दिवाली के मौके पर रिजर्वेशन मिलना लगभग असंभव ही है l पर इस वर्ष की होली में,  मै और खुशबू  घर जा सके क्योंकि बाबा भोले जी की अनन्य भक्त नम्रता जी भी गोरखपुर जा रही थीं, हमने वेटिंग टिकट ली और मजे से एक सीट पर बात करते हुए अपने घर पहुंचें l इस यात्रा में शिवकृपा से श्री अमरनाथ जी की यात्रा की चर्चा चल निकली l नम्रता जी पिछले कई वर्षों से लगातार अमरनाथ जी की यात्रा पर जा रही हैं l उन्होंने यात्रा का सांगोपांग वर्णन करना शुरू किया, हम दोनों पति-पत्नी विभोर हो सुनने लगे l उन्होंने बताया कि इस यात्रा में 'सेवाभाव' का बड़ा ही महत्त्व है, क्योंकि यह कठिन यात्रा परस्पर सहयोग से ही संभव हो पाती है l उनका यह भी कहना था कि इस यात्रा में ही, व्यक्ति के मूल चरित्र का परीक्षण हो जाता है, कौन कितना सेवाभाव में रह सकता है सब कुछ स्पष्ट हो जाता है l श्रीअमरनाथजी की यात्रा में एक यात्रा के लिहाज से सभी रोमांच शामिल हैं l अनिश्चितता है, मौसम का खेल है, बर्फ है, तीखी धूप है, सफ़ेद चमकती चोटियाँ हैं, तो उन चोटियों से रिसकर बनते-घिसते ग्लेशियर हैं और फिर कल-कल करती नदियाँ हैं, संकरे रस्ते हैं, कंपाने वाली ठंडक है, कहीं-कहीं ऑक्सीजन की कमी है, बारिश है, अठखेलियाँ करते श्वेत-श्याम बादल हैं और सबसे बड़ी बात कुछ दिनों के लिए बिजली, फोन, इन्टरनेट, सभी कुछ ठप हो जाते हैं, होते हैं तो सिर्फ आप और हिमालय की वादियाँ l यों मन तो किस भक्त का नहीं होता श्री अमरनाथ जी यात्रा पर जाने का लेकिन यह यात्रा अपने लिए असंभव ही लगती रही है l फिर यह भी कि ऐसा सुसंयोग बन सके, यह एकदम अपने हाथ में तो नहीं ही है l सच है कि बाबा बुलाएँगे तो संयोग बनते जायेंगे l सकुचाते हुए ही सही हम दोनों ने उनसे अनुरोध किया कि इस वर्ष की यात्रा में हमें भी अपने साथ ले चलें l उन्होंने तुरंत ही भोले भैया (राजेश भाई) को फोन लगाया और हमारे जाने की सूचना उन्हें दी l मालूम पड़ा कि श्री अमरनाथ जी की यात्रा पर जाने वाले शिव भक्तों की एक दीवानी टोली है जो 'जय भोले जी की सेवा समिति' के नाम से कार्य करती है और इस यात्रा पर जाने वाले भक्तों की सेवा-सहायता पूरी तत्परता से करती है l अगले दो दिनों में ही दिल्ली से उधमपुर के लिए हमारी टिकटें बुक हो गयीं l अब हमें यात्रा आवेदन पत्र और मेडिकल पास बनवाना था जो श्री अमरनाथ जी श्राईन बोर्ड द्वारा अनुमोदित सरकारी अस्पतालों से मेडिकल परीक्षण के उपरांत मिलता है l शिवकृपा से एवं 'जय भोले जी की सेवा समिति' की निर्णायक सहायता से समस्त आवश्यक औपचारिकताएँ भी हमारी पूरी हो गयीं, योजना इतनी बन गयी थी कि हम 30 जून को दिल्ली से उधमपुर की ओर रवाना होंगे और 2 जुलाई को हम चन्दनबाड़ी रूट से श्रीअमरनाथ जी पवित्र गुफा की ओर प्रस्थान करेंगे l 
18 मार्च को ट्रेन में जब नम्रता जी (बीच में) ने हमें यात्रा के बारे में बताया 

इतनी प्रसन्नता यही सोचकर हो रही थी कि हम श्रीअमरनाथजी जा सकेंगे, हम सचमुच जा रहे हैं l मैं हमेशा सोचता हूँ कि यदि बहुत सौभाग्यशाली व्यक्तियों को ही बाबा बुलाते हैं और उनके दर्शन केवल उन्हें ही मिलते हैं जो उनके निर्मल भक्त हैं तो निश्चित ही मै उस पंक्ति में नहीं हूँ l लेकिन शिवकृपा का एक स्पर्श आपको कहीं भी किसी भी पंक्ति में व्यवस्थित कर सकता है l इस बिंदु पर यह मै जानता था कि यात्रा की औपचारिकताएँ किसी रीति से पूरे हो जाने का अर्थ यह नहीं है कि बाबा बर्फानी जी के दर्शन हो ही जाएंगे l अभी तो इसमें कितने ही पड़ाव हैं l सबसे पहले तो स्वयं का स्वास्थ्य l हमें अब निश्चित ही यात्रा तक स्वस्थ रहना है, आप जानते हैं कि स्वस्थ रहना एकदम अपने ही हाथ में तो नहीं ही है l दुर्गम, पैदल यात्रा करनी है तो समिति द्वारा हमें बताया गया कि हम दोनों को अब रोज पाँच किमी कम से कम चलने का अभ्यास करना चाहिए, अन्यथा वहाँ मुसीबत में पड़ना होगा l फिर इस यात्रा में सुरक्षा का पहलू बहुत ही अहम है l भारत सरकार और राज्य सरकार श्रीअमरनाथ जी की यात्रा के लिए सुरक्षा के अनगिन इंतजाम करते तो अवश्य ही है लेकिन किसी भी आतंकी हलचल की एक छोटी सूचना भी यात्रा को रोकने के लिए काफी होती है, फिर यात्रा तभी आगे बढ़ती है जब सुरक्षा बल इस विश्वास में आ जाते हैं कि अब यात्रा सुरक्षित है l सुरक्षा की वज़ह से यह यात्रा काफी अनिश्चित हो जाती है l अमूमन 45 दिनों तक चलने वाली यह यात्रा सुरक्षा कारणों से कभी भी स्थगित की जा सकती है l आज (03/08/19) को जब मै यह विवरण लिख रहा हूँ तब भी सरकार ने सुरक्षा कारणों से यह यात्रा स्थगित कर दी है l स्वास्थ्य, सुरक्षा के बाद मौसम एवं भौगोलिक कारण हैं जो इस यात्रा को दुष्कर एवं अनिश्चित बनाते हैं l इस यात्रा में मौसम का कोई ऐतबार नहीं l बारिश कभी भी आपकी यात्रा को कठिन अथवा असंभव भी बना सकती है l यात्रा के दौरान कैसा मौसम रहेगा, अभी मानव जाति यह बता पाने भर को तकनीकी प्रगति नहीं कर सकी है l बारिश से भूस्खलन का गंभीर खतरा भी है यात्रा में तो इसलिए भी कभी भी यात्रा रोकी जा सकती है l रास्तों की अपनी चुनौतियाँ, असुविधाएं तो हैं ही, इन सबके बाद यदि कोई पवित्र गुफा तक पहुँच सके तब ही समझो उसे बाबा बर्फानी ने अपने दर्शन के लिए चुना है l समिति की तरफ से एक यात्रा विवरणिका दी गयी, जिसमें तिथिवार हमारी यात्रा के पड़ावों के बारे में बताया गया था, लेकिन सबसे रुचिकर पंक्ति यह थी:  'यह योजना हमने अपनी सीमा में बनायी है बाकी होगा वही जो बाबा बर्फानी चाहेंगे l' 

तो मेरे मन में स्वयं के सब प्रकार की अयोग्यता को लेकर एक लगातार ऊहापोह चल रहा था, पता नहीं मेरी यात्रा पूरी हो सकेगी कि नहीं l फिर मैंने सबकुछ बाबा पर छोड़ा, सोचा जो करना है अब उन्हें करना है l यात्रा की कठिनाइयाँ और इसकी अनिश्चितता यही दोनों पहलू इस यात्रा को दुष्कर बना देते हैं लेकिन यही तो इसे विशिष्ट भी बनाते हैं l मेरा यह आशय नहीं है कि यह यात्रा असंभव ही है, बल्कि मै यहाँ दो बातें स्पष्टतया रेखांकित करना चाहता हूँ कि यह यात्रा यकीनन दुष्कर है लेकिन शिवकृपा से, भक्तों के सेवाभाव से और समिति की सहायता से यह यात्रा अंततः सुगम हो जाती है l इतनी सुगम हो जाती है कि मेरे जैसा औसत कदकाठी, औसत स्वास्थ्य और औसत स्टेमिना का व्यक्ति यदि यह यात्रा कर सकता है तो यह यात्रा कोई भी श्रद्धालु कर सकता हैl

जून का महीना खासा व्यस्त हो गया l मेरी छुट्टियाँ विश्वविद्यालय में नहीं हुईं लेकिन खुशबू के स्कूल की छुट्टियाँ हो गयी थीं l हमने सोचा साथ के चक्कर में खुशबू की भी छुट्टियाँ यूँ ही गुजर जायेंगी तो खुशबू घर वालों के पास गोरखपुर चली गयीं l वो हैदराबाद, बंगलौर, पुणे और बनारस गयीं, मै इधर ग्रेटर नोयडा में रहा l यह लिखने का मकसद इतना ही कि जिस जून में नियमित दिनचर्या से गुजरना था ताकि श्री अमरनाथ जी की तैयारी ठीक से हो सके, पाँच किमी रोज चलने के अभ्यास का क्या कहें, साधारण खानपान भी हम दोनों का अव्यस्थित रहा l अब सहारा इतना ही था कि दोनों पेशे से अध्यापक हैं और घूमघूम कर कक्षाएं लेते हैं तो हमें विश्वास था कि हमारा शरीर में हमें यात्रा में धोखा तो नहीं ही देगा l यों डर तो लग ही रहा था पर अब ये था कि सब बाबा जानें l यात्रा के चार दिन पहले खुशबू घर से लौटीं और हमें अब यात्रा के लिहाज से शॉपिंग  करनी थी l समिति की तरफ से भोले बाबा जी (राजेश भैया) लगातार निर्देश-सुझाव एवं उपयोगी वीडियोज बना व्हाट्सएप्प पर भेज रहे थे l यात्रा के लिए जरुरी सामान कौन-कौन से हैं, क्या ध्यान रखना है, कौन सी गलतियाँ नहीं करनी हैं, आदि-आदि l इन वीडियोज से सचमुच बेहद मदद मिली l मन में एक खाका बन पाया कि हमारी तैयारी कैसी होनी चाहिए l बीच में राजेश भैया ने श्री अमरनाथ जी की एक ताजा तस्वीर हम लोगों से साझा की l यह तस्वीर बेहद मनोहारी थी l इस बार शिवलिंग काफी बड़े आकार में था और इसबार बर्फ काफी गिरी हुई थी l 

राजेश भैया ने  बाबा बर्फानी की यही तस्वीर साझा की थी 

हमने लिस्ट बनाकर अपनी शॉपिंग पूरी की और कुछ अवसरों पर नम्रता जी ने और समिति ने हमारा काम आसान बना दिया l खुशबू को लगा था कि उसे स्कूल से छुट्टियाँ नहीं मिल पाएंगी और मुझे भी लगा कि मेरे लिए भी दिक्कत होने वाली है पर जब बाबा बुलाएँगे तो बीच में कौन आएगा l फिर वो दिन भी आया जब शाम को हमें नयी दिल्ली स्टेशन से ट्रेन उधमपुर के लिए पकड़नी थी यानी 30 जून, 2019.  सुबह से ही खूब उत्साह से हमने अपना सामान पैक किया l हल्का खाना खाया और नियत समय की प्रतीक्षा करने लगे l हम दोनों ने गाढे रंग की गुलाबी टी-शर्ट पहन रखी थी l उस समय के मन का रोमांच हमारे शांत व्यवहार से कोई आंक नहीं सकता था l 

यात्रा के लिए तैयार हम

(क्रमशः)

Wednesday, April 3, 2019

आम औ गाँव- आलोक रंजन

अलग अलग तरह के आम एक ही समय में अलग अलग किस्सों की ओर ले जा रहे हैं । कच्चे आमों के किस्सों से लेकर पके #आमों_की_रसीली_दास्ताँ सब एकसाथ खुल रही हैं ।

छवि: आलोक रंजन 


अभी गर्मी उतनी ही है जितनी आधे मई के आसपास अपने उत्तर में होती है । यहाँ केरल में बिना चप्पल के तो नहीं चला कभी लेकिन बचपन में एक हवाई चप्पल के टूटने और दूसरे चप्पल के आने तक की दुनिया में बिना चप्पल के रहने का सुख भी था और उसके दुख भी ! धूप में तप रही जमीन पर पैर नहीं पड़ पाते थे । एक कदम रखा कि शरीर अपना सारा भार दूसरे पैर पर डालने को विवश हो जाता ! मेरे लिए चप्पल की दिक्कत एक दो दिन से लेकर हफ्ते भर तक की ही रहती थी लेकिन मैं जहां रहता था (बिहार ) वहाँ के सौ दो सौ लोग ठीक उसी समय और ठीक उतनी ही धूप में खाली पैर कोई न कोई काम कर रहे होते । उन धूप भरे दिनों में आम की भुजनी / भुजबी / भुजिया का दौर चलता था ।

हम बच्चों के लिए यह बड़ा ही अलग था । ‘मॉर्निंग इस्कूल’ से भागकर या छुट्टी के बाद सीधे गाछी । हमारे पास बड़ों की दाढ़ी बनाने वाली ब्लेड रहती थी । वे ब्लेडें ऐसी जिनसे कई बार दाढ़ी बनायी जा चुकी होती और उनकी ‘धार मर’ चुकी होती थी । हम वे फेंकी हुई ब्लेड और कागज की पुड़िया में नून-बुकनी (नमक – मिर्च का पावडर) लेकर चलते थे । जहाँ कहीं कोई ‘टिकला’ (टिकोला /टिकोरा) मिला कि ब्लेड से छील कर नून बुकनी के साथ चट कर जाते । वैसे यह आदर्श स्थिति थी । बहुत बार ब्लेड साथ नहीं होते तो कई बार केवल नून मिल पाता । इसके पीछे पूरा अर्थशास्त्र काम करता था । नमक की तुलना में मिर्च काफी महँगी होती है सो बुकनी न तो अपने घर से न ही किसी और के घर से आसानी से मिल पाती थी । ऊपर से टिकला खाना सबसे गैर जरूरी काम माना जाता था । उसके लिए डांट पड़ती थी और मार भी । लेकिन वह बच्चा ही क्या जो डांट और मार के डर से टिकला खाना छोड़ दे ! हम धूप में टिकले बटोरते और कहीं बैठ के खाते । कभी कभी बिना नमक मिर्च के भी खा जाते थे । आज शायद ही यह सब हो पाये ! लेकिन सबसे ज्यादा मज़ा उन दिनों में आता था जब दोपहरें गंभीर होने लगती थी , टिकले थोड़े बड़े हो जाते थे । उन दोपहरों में माँ- मौसियों और थोड़ा बाद में मामियों की दुनिया खुलती थी ।

मेरी माँ लंबे समय तक अपने नैहर में रही थी सो मैं भी वहाँ रहता था । पिताजी उन दिनों अपने कॉलेज में ही रहा करते थे और हर आठवें दिन पड़ने वाली ‘अष्टमी’ या ‘परीब’ की छुट्टी पर अपनी ससुराल ही आ जाया करते थे । बहरहाल वे गंभीर दोपहरें ! उन दिनों को बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए हैं बस आज से बीस – पच्चीस साल पहले की बात है बस ! मानव इतिहास में इतने साल बहुत मायने नहीं रखते लेकिन जिस तेज़ी से इन सालों में बदलाव आए हैं उसके हिसाब से लगता है कि वे दिन सौ साल पहले रहे होंगे । या नहीं तो कोई और दुनिया रही होगी जब सबके यहाँ टीवी नहीं आया था और पुरुषों का शाम को एक साथ बैठकर रेडियो सुनना जरूरी काम हुआ करता था । ठीक उन्हीं दिनों की दोपहर में कुछ दोपहरें ऐसी होती थी जो आम की खटास से ‘दाँत कोट’ (दाँत खट्टे) कर जाती ।


मौसियाँ या फिर हम बच्चे आम लाते फिर उन्हें छीलकर कद्दूकस किया जाता । कद्दूकस किए हुए आमों में नमक , बुकनी और फिर सब्जी में पड़ने वाला भुना हुआ मसाला मिलाया जाता फिर बनती ‘भुजबी’ या भुजनी । आज वह चटपटा स्वाद सोचकर ही मुँह में पानी आ रहा है । भुजबी में मिर्च ज्यादा डाली जाती थी सफ़ेद आम के लच्छों पर लाल लाल बुकनी का साम्राज्य ! मिर्च के तीखेपन से मुँह जलता रहता , सु सु की आवाज़ निकलती रहती , आँख से आँसू बहते रहते लेकिन उस चटपटे स्वाद में थोड़ा ज्यादा पा लेने के लिए धींगामुस्ती , मान-मनौव्वल , प्यार –दुलार और बेईमानी जारी रहती । भुजबी का ज्यादा बनना जरूरी था क्योंकि बहुत से लोग थे । हालाँकि पुरुष नहीं खाते थे बल्कि वे डांट ही लगा दिया करते थे । असल में एक बड़े घर में नाना के चार भाई अपने अपने परिवारों के साथ रहते थे । खाना चारों परिवारों का अलग बनता था और उस घर में सबके अपने अपने हिस्से के कमरे भी थे लेकिन रात हो या दिन जबतक कोई अनबन न चल रही हो तबतक लगता ही नहीं था कि कौन किस घर का हिस्सा है । आसपास के परिवारों का भी यही हाल था । और सबका आपस में मेलज़ोल अनबन से पहले तक बहुत घनिष्ठ रहता था । अनबन के बाद भी फिर से जुड़ जाना बड़ा सहज था । कोई भी अनबन लंबे समय तक चलते नहीं देखा मैंने । तो बात हो रही थी भुजबी की ! ज्यादा लोगों के लिए ज्यादा आम चाहिए थे सो रोज ऐसा आनंद नहीं मिल पाता था । लेकिन जब यह कर्मकांड होता था आनंद का अलग ही स्तर चलता था । बाद के वर्षों में मामियों के आने से उनके यहाँ के स्वाद आए । कोई दही डालने की हिमायती तो कोई दूध के ऊपर की मलाई ! असल मकसद स्वाद का चरम पा जाने का रहता था !

उन्हीं दिनों मुझे कई बार लगा कि स्वाद की विविधता के निर्माण और उसके हस्तांतरण में स्त्रियों की ही भूमिका होती है !




(सुप्रसिद्ध युवा रचनाकार, प्रसिद्ध यात्रावृतांत 'सियाहत' के लेखक)

सभ्यता की कलावीथिका- सत्यम् सम्राट आचार्य

'सौन्दर्य' शब्द अपने आप में नवीनता का आभास कराता है और इसके विलोमज के रूप में प्राचीनता प्रतिनिधित्व करती है 'प्रौढ़ता' का.  लेकिन यहां अजंता की वीथियों में टहलते हुए यदि आपको शैलाश्रयों की भित्तियों पर बुद्ध की औदार्य मुद्राओं और अप्सराओं की भावांगिमाओं के चित्र दिखाई दें तो प्राचीनता के इस चिरंतन सौन्दर्य की तुलना आप आधुनिकता के सर्वोच्च कला प्रारूपों से कर सकते हैं.

अजंता के कला साधकों की सौन्दर्योपासना का यह प्रतिफल संसार की किसी भी महनीय कलाकृति से तुलना किए जाने योग्य है. यथार्थ में कला की 'तपस्या'अजंता के पाषाण खण्डों पर ही परिलक्षित होती है इसके अन्यत्र बाकी सारे चित्रांकन 'सौन्दर्य के प्रलाप' भर है.







सभ्यता के उस ऊषाकाल में हमारी संस्कृति जागृति की उस अवस्था में थी जहाँ तक पहुंचने के लिए युरोप को पुनर्जागरण की लम्बी प्रतिक्षा करनी पड़ी. पूरब को बर्बर जातियों का आश्रय समझने वाले युरोप के सारे औपनिवेशिक सिद्धांत ,अजंता और इसके समवर्ती अलोरा की खोज के बाद महत्वहीन साब़ित हो गये हैं.

गुफा नम्बर 10 के एक भित्तिचित्र पर ब्रिटिश अधिकारी 'जॉन स्मिथ' ने जब 1819 की तिथि सहित अपने हस्ताक्षर खुरचे ,बस तभी पूरब के सौन्दर्य ने पश्चिम का मोहभंग कर दिया था और उसके बाद "युरोपिय सौन्दर्य के सारे कला प्रतिमानों ने आत्मसमर्पण कर दिया अजंता के द्वारमण्डपों के नीचे" । 

ये मेरा दूसरा दौरा था अजंता और अलोरा के लिए.
इन्दौर के 'स्मार्ट' वातावरण में मुझे एेसी कोई देवांगना नहीं मिली जो इन चित्रों का प्रारूप बनने के लिए तैयार हों. सो मैं ईसापूर्व पांचवी शति में बनी अजंता की वीथियों में इन अप्सराओं से अनुरोध करने चला आया.







पं नेहरू की हिन्दुस्तान की कहानी में पढ़ा था ''अजंता एक स्वप्नमय विश्व है''. 
मैं इसे सभ्यता की कलावीथिका कहूंगा... समय का एक एेसा स्वर्णिम गलियारा जहां से हम टहलते हुए इस दौर में पहुंचे हैं.

यहां धर्म ने अपने 'अनुभवातीत स्वर्गीय साध्य' तक पहुंचने के लिए 'अनुभवजन्य कला' के आलंकारिक सौन्दर्य को एक 'साधन' मान लिया है. बिल्कुल खजुराहो की भांति जहां गर्भगृहों के अन्दर प्रतिष्ठित 'धर्म के सनातन सत्य' की व्याख्या कर रहे हैं देवगृह के परिक्रमापथ पर उत्कीर्णित 'कामशास्त्र के कला प्रादर्श'. कुछ वैसे ही यहाँ अजंता की वीथियों में पाषाण भित्तियों पर उकेरा गया देवांगनाओं का आलंकारिक सौन्दर्य, अनुसरण कर रहा है चैत्यगृहों में अवस्थित अमिताभ की ध्यानस्थ शिल्पाकृतियों से.

सौन्दर्य की यह चित्रात्मक अभिव्यक्ति इतनी चैतन्य है मानो आज भी चैत्यगृहों के स्तूपों में दबी बुद्ध की अस्थियों को पुनः सिद्धार्थ बनकर कपिलवस्तु जाने के लिए उकसा रही हो. हमने कथाएँ पढ़ी हैं लोकरंजक आख्यानों में, दंतकथाओं से उन्हेें सुना है, लेकिन 'सभ्यता का कथात्मक इतिवृत' एक धारावाहिक के रूप में आज भी अजंता के पत्थरों पर उकेरा हुआ है.

ये सौन्दर्य की अनुपमेय कृतियां उन्हीं जातक कथाओं की नायिकाएं हैं जो आज 2000 वर्ष बाद भी पाषाणों के रंगमंच पर अपने पात्रों को अभिनीत कर रहीं है. लेकिन इस रंगमंच के नैपथ्य में अजंता के शिल्पकारों और सर्जक कलाकारों के हाथ निश्चित ही सृष्टिकर्ता के हाथों की प्रतिकृति रहे होंगे जिन्होंने हमारी सभ्यता के इस विशाल 'एकाश्मक कैनवास' पर हमारी संस्कृति की व्याख्या को कला के अद्वितीय प्रादर्श के रूप में उपनिबद्ध किया.

मैं अजंता के इस स्वप्नलोक में तब तक जाता रहूंगा जब तक कि मुझे उन लोगों के पद्चिन्ह नहीं मिल जाते जिन्होने इसे रचा है. कालचक्र की परिधि को लांघने का यदि मुझे सुअवसर मिले तो मैं जाना चाहूंगा उस दौर में जहां वाघुर नदी के चन्द्रपरास पर अजंता के शिल्पियों की पत्नियां उनके लिए पानी भर रहीं हों, बोधिसत्व पद्मपाणी के रेखाचित्र की उपकल्पना करने वाले चित्रकार के मुख की गंभीरता को मैं देखना चाहूंगा, राहुल और यशोधरा के सामने भिक्षा मांगते बुद्ध का चित्र खींचने वाली तूलिका का सामर्थ्य देखना चाहूंगा, पूछना चाहूंगा उन शिल्पकारों से कि अवलोकितेश्वर का ध्यानस्थ मुख बनाते समय उन्होंने अपने दृढ़ औजारों को उदारता और कृपणता कैसे सिखलाई होगी, बोधिसत्वों की मुख मुद्राएँ उकेरते समय उन्होने कौन सा दर्शन पढ़ा होगा...!

फिलहाल मैं अपनी कालयात्रा यहीं स्थगित करता हूं, यदि आप इस स्वप्नलोक का भ्रमण करने के इच्छुक हैं तो अपने या अपने जैसे किसी के साथ औरंगाबाद की बस पकड़ लीजिए।