नवोत्पल में आपका स्वागत है...!

Friday, April 20, 2018

दिल्ली की किताब / शचीन्द्र आर्य (दूसरी किश्त )

___________________________________________________________________________
(दूसरी किश्त) 

चाचा के लिए
अब जबकि कुछ देर में अंधेरा होने वाला है, सोच रहा हूँ, जहाँ से छोड़ा था, वहाँ से शुरू कैसे करूँ? यह बहुत मुश्किल प्रक्रिया है। आप अपने अंदर अतीत को उम्र में बहुत आगे बढ़ जाने के बाद पीछे मुड़कर देखते हैं। इस मुड़ने में बहुत सी बातें एक साथ कौंध जाती है पर मैं चाचा से शुरू करना चाहता हूँ। इसे गाँव से शहर में दाख़िल होने की तरह देखने से पहले इतना बताना ज़रूरी है कि इसी समानुपात में गाँव भी हममें प्रवेश करता है। वह एक बहुत पुरानी तस्वीर है, जिसमें छोटके चाचा ने मुझे गोद में ले रखा है। मम्मी उनके बगल में खड़ी हैं। चंद्रभान उनके दूसरी तरफ़ खड़े हैं। पीछे कुतुब मीनार है। तस्वीर ब्लैक एंड व्हाइट नहीं है। कलर है।

फ़ोटो पापा ने खींची है।

 ©शचीन्द्र आर्य 
यहाँ, इस तस्वीर से शुरू के पीछे सिर्फ़ एक वजह है। चाचा अपने बड़े भाई के यहाँ घूमने आए हैं। कुछ दिन साथ रह सकें। थोड़ा वक़्त बिता सकें। पापा बताते हैं, पापा चाचा को सिनेमा हाल में बिठा आते थे और तीन घंटे बाद दोबारा जाते और चाचा को घर ले आते। फ़िल्म देखने का बहुत शौक़ था। बहराइच के हरी टाकीज़ में बाहर तांगा खड़ा किया और सवा रुपए से भी कम पैसे में टिकट लेकर एक समोसे पर पूरा दिन बिता ले जाते। यह तांगा, उनका खड़खड़ा था, जो घोड़ी रखने की उनकी इच्छा के बाद मूर्त रूप लेता है। जब घर में कोचवान हो तब उनका उपयोग भी होता। दुकान का गल्ला उसपर लादते और बाबा के साथ जाकर उसे गल्ला मंडी में बेच आते। फ़िर एक मौसम आता, जब मोहर्रम के बाद बिसवां, चालीसवाँ तक दूर दूर गाँव में मेला लगता। जुलूस एक जगह आकर इकट्ठा होता और लगी हुई दुकानों से मनचाहा सामान खरीदता। बाबा की मिठाइयों की दुकान होती। चाचा उनके सहायक। कई मर्तबा तो हम भी गर्मी की छुट्टियों में उनके साथ साइकिल पर ऐसे छोटे बड़े मेलों में गए। 

Image Source-IBN7

यह गर्मियों की छुट्टियाँ ही होतीं, जहाँ हम अपने स्कूल का दिया काम जल्दी से खत्म करके गाँव जाने की धुन में रम जाते। गाँव के उस पीछे खपरैल वाले घर में सटर वाला दो रंगा टेलीविज़न कैसे पहुंचा, इसका कोई हवाला हमारी स्मृति में नहीं है। हमने उसे वहीं सीमेंट की टाड़ पर रखा हुआ देखा। हर इतवार दुकान में सौदा लेने आए बच्चे, जवान सब चार बजते ही मधुमक्खी की तरह दालान में भिनभिनाने लगते। चार बजे दिल्ली दूरदर्शन से फ़िल्म आने वाली होती। छत पर लगे सौर ऊर्जा पैनल से बैटरी चार्ज होती, और उसी से टीवी चलता। वहीं ताखे वाली अलमारी में तब मंदिर नहीं बना था। वहाँ मर्फी का टेपरिकॉर्डर रखा हुआ था। इसमें मीटर वेव और शॉर्ट वेव रेडियों भी था। पास ही कैसिटों का अंबार लगा हुआ था। चाचा जो कैसिट कहते पापा यह तो गर्मियों में अपने साथ लिए चलते या कोई आता जाता तब उसके हाथों भिजवा दिया करते। इस सबमें चाचा ही ऐसी धुरी थे, जो उस गाँव में बीत रहे वक़्त से बहुत आगे चल रहे थे। हम भी जितना वक़्त गाँव पर रहते उनके आस पास घूमते रहते। एंटीना घुमाने से लेकर टीवी चलाने के सारे अधिकार इन्हीं छोटके चाचा के पास थे। हम भी शहर से इतनी दूर एक शहर को उस मशीन में खोज रहे होते। ऐसा नहीं था, हम वक़्त बिताने के लिए सिर्फ़ यही काम किया करते। नहीं। हम पापा के मामा के यहाँ जाते। रवि के यहाँ बरवाँ जाते। गिलौला से सेवढ़ा, नानी के यहाँ जाते। ख़ूब सारी तसवीरों में वह पल अपने साथ हमेशा के लिए रख लिया करते। पर आज बात सिर्फ़ चाचा की। 

कोई कहे या न कहे, जब लकड़ों की शादी हो जाया करती है, तब जो लड़का नहीं कमाता है, वह सबकी आँख में किरकिरी की तरह चुभने लगता है। चाचा इस व्याख्या में श्रम विभाजन की सैद्धांतिकी में सिर्फ़ सहायक की भूमिका में थे। बिरेन्द चाचा जब बहराइच जाते, तब ननकू चाचा दुनाक संभालेंगे। गल्ला मंडी जाना होगा तब अपने खड़ खड़े को हाँकते हुए मंडी ले जाएँगे। कभी गाहे बगाहे बाबा के साथ किसी मेले में चले गए। इसके अलावे उनके हिस्से कोई काम पड़ता हुआ नहीं दिखता। घर में खेती लायक ज़मीन होती, तब बात ही क्या होती। सब अलग-अलग तरह के पेशों में संलग्न रहते। पर ऐसा हुआ नहीं। चाचा इस विभाजन में कहीं नहीं ठहरते। चाची के आने के बाद उनका भी परिवार अस्तित्व में आया। उनके साथ एक मसेहरी, चार कुर्सियाँ, एक मेज़ आए। थोड़े दिन यह दिखे। फ़िर कुछ साल पीछे हमारी बहनें हुईं। चाचा चाची के यहाँ लगातार तीन बेटिययों के बाद दो जुड़वा बच्चे हुए जो जन्म के दस दिन के भीतर मृत्यु को प्राप्त हुए। इसके कई साल पीछे शिवम हुआ। हमारा सबसे छोटा चचेरा भाई। 

जैसे-जैसे सदस्य बढ़े, आय के सीमित साधनों में झगड़ों का उदय हुआ। संयुक्त परिवार दरअसल एक समझौते पर कायम संस्था है और जो इसे बढ़िया मानते हुए स्वर्णिम अतीत में खो जाते हैं, उनसे मुझे कुछ नहीं कहना। वह शायद बड़ों के लिहाज और लगातार अपने आत्म सम्मान को ताक पर रखकर जिंदा संस्था है, जिसमें सिर्फ़ शोषण और बर्बरता के आदिम सूत्र आज भी दिख जाते हैं। इससे बचने का एक ही तरीका था। बँटवारा। चाचा के हिस्से चौराहे पर सड़क किनारे बनी दो दुकाने आयीं। जिसका उपयोग चाचा ने किसी थोक दुकान को शुरू करने के लिए नहीं किया। वह सपरिवार वहीं चले गए। आगे टीन छाई। जगह बढ़ गयी। वह उस जगह क्यों आइए इसका चाची के पास एक ही जवाब था। जो गाँव वाला टुटहा घर मिला है, वहाँ क्या साँप बिच्छु के बीच आपन बच्चे नचाई। 

कमाई के साधन के रूप में एक ढाबली ने ले ली। एक लकड़ी की संरचना, जिसमें एक वक़्त में सिर्फ़ एक ही व्यक्ति अंदर बैठ सकता है। सिर्फ़ बैठ सकता है। खड़ा नहीं हो सकता। इसी में पान मसाले, बीड़ी से लेकर माचिस, साबुन, नमकीन, बिसकुट सब थोड़ा-थोड़ा भर लिया। सुबह होते ही दुकान खुल जाती और देर रात ग्यारह बजे तक चाचा बैठे रहते। शिवम चाचा की तबीयत खराब होने के बाद से बैठने लगा। उसने पेट्रोल बेचना शुरू कर दिया। मूँगफली और लाई भी इसके बाद अलग तखत पर रखे जाने लगे। तेल पेट्रोल पंप पर जितने का बिकता है उसमें लाने और अपने पास रखने की लागत मिलाकर दाम बताया जाता। गरीबी का अनुवाद बकरियाँ भी हो सकता है, यह चाचा के यहाँ पहली बार अनुभव संसार का हिस्सा बना। बकरियाँ पालना इसके और कसाई के हाथों बेचना तीन-चार साल पहले बंद कर दिया। पापा हर बार जाते और यही कहते। पहले पालो और फ़िर किसी को मारने के लिए बेच दो। कभी ख़ुद भी सोचा होगा। तब तय किया होगा, अब नहीं पालेंगे। इसमें मनोज कुमार पाण्डेय की कहानी, 'पुरोहित जिसने बकरियाँ पाली' का कोई योगदान नहीं है। क्योंकि उन्होंने ऐसी कोई कहानी लिखी ही नहीं है। 

इधर चार पाँच साल से चाचा को पेचीस की शिकायत कुछ बढ़ गयी। उनका मन किसी भी काम में नहीं लगता। दिन में दस दस बार से भी ज़्यादा बार मैदान फिरने जाना पड़ता। तब पिछवाड़े शौचालय बनवाया नहीं था। वह बना ही इसलिए क्योंकि झाड़ा फिरने का कोई नियत समय नहीं था । कभी भी जाना पड़ सकता था। सेप्टिक टेंक के की खुदाई के बाद पक्की छत पड़ी और सीट बिठा दी गयी। पानी लाओ और बैठ जाओ। यह दरअसल उनके अंत की शुरुवात थी। उन्हें लगा, बवासीर है। सामने किसी ने ऑपरेशन करवाया था, उसका ठीक हो गया। वह भी करवाएँगे, ठीक हो जाएँगे । यही सोच पिछले साल बहराइच में सर्वेश शुक्ला के यहाँ फागुन के बाद संतराम फूफा के साथ एक सुबह चले गए। डॉक्टर इससे भी भोले हो सकते हैं, यह पता नहीं था। चाचा ने कहा, बवासीर है। डॉक्टर तुरंत मान गया। ऑपरेशन की तारीख दे दी। चाचा वक़्त पर पहुँच गए। डॉक्टर ने पैसा लिया और ऑपरेशन के नाम पर गूदा द्वार छोटा कर दिया। कहा अब ठीक हो जाओगे। 

चाचा डॉक्टर के कहे अनुसार ठीक नहीं हुए। सूख गए। देह में जान नहीं बची। उन्हें लगता, गूदा द्वार छोटा करने से पेट में गैस बनने लगी है और झाड़ा भी ठीक से नहीं उतरता है। वह अपनी बिगड़ती स्थिति के संबंध में किसी डॉक्टर से मिलना नहीं चाहते थे। तभी एक दिन लखनऊ से रीना के सुशील आए। वह जबर्दस्ती अपने चचिया ससुर को साथ ले गए। वहाँ डॉक्टर ने देखा। सीटी स्कैन करवाया। उसने कहा मलाशय (रेक्टम) का कैंसर है। यह बात चाचा को सीधे बताई नहीं गयी। सुशील का दिल्ली फ़ोन आया। पापा से बात हुई। गाँव का एक बाभन मिला, जो बहराइच में किसी श्याम गंभीर डॉक्टर के यहाँ ड्राइवरी करता था, उसने कहा, डॉक्टर साहब से बात करता हूँ। लखनऊ में किसी पहचान के अस्पताल में सस्ते में करवा देंगे। इस ऑपरेशन में गूदा मार्ग को बंद कर देते और मल निकासी के लिए प्लास्टिक की नली कहीं से निकाल देते। 

एक ऑपरेशन से ऐसी हालत में पहुँच जाने के बाद इस दूसरे ऑपरेशन के लिए वह मान नहीं रहे थे। किसी तरह कीमो थेरिपी के लिए माने। कीमो के ग्यारह दौर के बाद रेडियो थेरेपी शुरू होती। लेकिन पहली बार में ही हालत इस कदर बिगड़ गयी कि वापस अस्पताल जाने की हिम्मत नहीं हुई। चाचा ने तो कह दिया, घर ले चलो। जो होगा देखे लेंगे। हम सब वहीं थे। मूक दर्शक बनने के सिवा हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। हमें पता है, उनके पास अब गिनती के छह आठ महीने बचे हैं, पर चाह कर भी उन्हें बता नहीं सकते। पता नहीं उन्हें कैसे इस बात का एहसास हो गया। एक रात कहने लगे, नियामत भी लखनऊ आए थे। ठीक नहीं हो पाये। मैं भी ठीक नहीं होऊंगा। एक व्यक्ति हमारे सामने हार रहा है, हम कुछ नहीं कर पा रहे थे। ऐसा नहीं है वह ठीक नहीं होना चाहते थे। उनके मन में था, किसी तरह उनके शरीर में ताकत आ जाये। वह कहते, पहले, जब तबीयत ठीक थी, तब पता नहीं कितने किलोमीटर लगातार चल सकते थे। आज की तरह थोड़े कि छत से उतरते हुए हाँफने लगते। यह दुख लगातार बढ़ता रहा। कम हुआ ही नहीं। 

यह जुलाई की बात है। तब सीमा की शादी तय नहीं हुई थी। लड़के वाले आकर देख चुके थे। तारीख़ पर कहने लगे, नवरात्र के बाद बात करेंगे। लगता है चाचा अपनी उम्र को लेकर बिलकुल स्पष्ट हो गए थे। वह सिर्फ़ शादी में बैठे रहना चाहते थे। दिवाली के पहले लखनऊ दोबारा आए। मैं दिल्ली से उनका पैट स्कैन लेकर वहाँ पहुँच रहा था। गाड़ी पाँच घंटा लेट हो गयी।  जिसे सुबह सात बजे पहुँचना था, वह साढ़े बारह के लगभग चारबाग पहुंची। रिपोर्ट मेरे पहुँचने से पहले मोबाइल से अस्पताल पहुँच गयी। मेरा किंग जार्ज पहुँचना बेकार हो गया। डॉक्टर ने गंगा राम के कराया स्कैन देखा भी नहीं। सीधे अगले सम्बद्ध विभाग में फ़ाइल भेज दी। ओपीडी का वक़्त एक बजे ख़त्म हो गया। डॉक्टर ने कहा, कल सुबह आना। जिस ऑपरेशन के लिए तीन महीने पहले मना कर चुके थे, उसके लिए मान तो गए, पर इस बार डॉक्टर तय्यार नहीं हुए। कहने लगे, क्रिटिकल स्थिति है। शरीर में ख़ून नहीं है। अच्छा यही है, अब अपने परिवार के साथ रहें और वह उनकी जितनी सेवा करना चाहते हैं, कर लें। कभी भी कुछ भी हो सकता है।

इन ब्यौरों में हमारे भीतर चाचा के न होने की कोई कल्पना घर नहीं बना पायी। हम सोच ही नहीं पाये कि अगले साल इन दिनों चाचा कहीं नहीं होंगे। मैं लगातार इतनी बार उन्हें देखता रहा और अंदर ही अंदर उस दृश्य, जिसमें उन्हें आख़िरी बार देखुंगा, उसे गढ़ने लगा। मुझे हर बार लगता, चाचा जब नहीं होंगे, यही क्षण होगा, जो मुझे याद रह जाएगा। हमारे अंदर चाचा की जो छवि थी, वह आज के बदहाल चाचा की नहीं थी। हमारी यादों में वह एक सेहतमंद, तंदुरुस्त चाचा ही रह गए। हमें लगता, जिन्हें हम अपने सामने अभी देख रहे हैं, वह हमारे चाचा नहीं हैं। बार बार कितनी ही यादें कौंध जाती। तीन साल पहले गजरा लेने दिल्ली आए थे। कैसे बरवां से लौटते वक़्त बहराइच में डायमंड पर लगी कोई फिल्म देखी थी। वह दिन जब मेट्रो खाली रहा करती थी, चाचा माल रोड पर खड़े हैं, पीछे विश्वविद्यालय सेटशन है। मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई, हमारे वह चाचा जो टीवी के बगैर एक दिन भी गुज़ार नहीं सकते थे, वह कैसे दिल्ली से लाये टेलीविज़न को ठीक करवाए बिना रह गए? उनके अंदर के हमारे चाचा कहाँ चले गए थे? 

हम जब गोण्डा से छोटी लाइन की पैसेंजर पकड़ कर बहराइच रेलवे स्टेशन पर उतरते थे, यही चाचा अपना खड़खड़ा लेकर हमारा इंतज़ार किया करते थे। कैसे टुक टुक करते इक्का चलता रहता था। आज उनकी हालत यह हो गयी कि बिना सहारे एक कदम चलना भी दूभर हो गया। देह इतनी दुर्बल हो गयी, कि वह न चाहते हुए भी दयनीय होते गए। शरीर में ख़ून तो बन नहीं रहा था, चेहरा एकदम काला पड़ता गया। कभी दर्द से इतना कराहते, कोई भी उनके उस दर्द को चाह कर भी कम नहीं कर पाया। एक ऐसा भी समय आया, जब वह अपनी नित्य क्रियाओं पर नियंत्रण खोने लगे। कभी कोई उन्हें उठाने वाला नहीं होता, तब भी बिस्तर खराब हो जाता। हमें देखा, इससे बचने के लिए उन्होंने एक रास्ता निकाला। वह अपने तकिये के नीचे काले रंग की थैलियाँ रखने लगे। इससे ज़्यादा ख़राब और नहीं लिख सकता। हमने अपने नानी को अपनी आँखों के सामने मरते हुए देखा है। एक पल पहले वह थीं और एक पल बाद वह नहीं थीं । लेकिन चाचा का इस कदर एक पल में कितनी ही मर्तबा मरते रहना देखा नहीं जाता। 
दो महीने पहले, फरवरी की बारह तारीख़ को सीमा की शादी थी। सबकी यही एक कामना थी। किसी तरह शादी ठीक से हो जाये। कोई अनिष्ट न हो। हम सपरिवार वहाँ थे। मैं कुछ पहले पहुँच गया था। चाचा इस शादी की तय्यारी को बैठे बैठे देखते रहना चाहते थे। लेकिन बहराइच में हुए ऑपरेशन के बाद उनका सीधे बैठना दुश्वार हो गया। वह अब ऐसी हालत में थे, जहां वह अपने संपर्कों का किसी भी तरह कोई उपयोग नहीं कर सकते थे। उनकी किसी भी राय का क्या हो रहा है, इसे जाँचने का कोई तरीका उनके पास नहीं बचा था। वह चुपचाप बिना कुछ कहे सब देख रहे थे। हममें इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उनके पास कुछ देर बैठकर बात कर लिया करते। इस बीमारी ने उन्हें सिकोड़ दिया था। एक बहुत हल्के कंबल को ओढ़े वह सारा दिन दुआरे चारपाई पर लेटे रहते। भारी रज़ाई में दम घुटने लगता और उसे हटाने की ताकत तक अब नहीं रह पाई थी। फ़िर कमरे में कहाँ अकेले पड़े रहते, यही सोच कितनी भी ठंड हो वह वहाँ से हटे नहीं । 

शादी बरसात के बावजूद ठीक से हो गयी। हम उसके चार दिन बाद सोलह को चलकर सत्रह को दिल्ली आ गए। ठीक  हफ़्ते भर बाद भोला मामा का फ़ोन आया। शुक्रवार की रात थी। पापा सो गए थे। साढ़े ग्यारह बज रहे होंगे। मामा बोले, जीजा का बोल बंद हो गया है। सांस उल्टी चलने लगी है। चले आओ। एक धागा, जो हमारे बचपन से आज तक हमें जोड़ रहा था, वह चिटकने वाला है, यह बहुत पास से हम देख आए थे। चाचा ने जीने की अपनी सारी इच्छा सिर्फ़ सीमा की शादी तक रोक रखी थी। वह भी किसी तरह उस दिन तक अपने को जिंदा रखना चाहते होंगे। यह ठान लेने के बाद आदमी हमारे चाचा की तरह हो जाता है। इस ज़िंदगी की उम्मीद को धूमिल पड़ता देख, वह ओझल हो जाना चाहते होंगे। कैसे भी करके इस दुख, असहायता, दुर्बलता के दिनों से भाग जाना चाहते होंगे। कितने ही सपने उन्होंने देखे होंगे और वह ऐसे ही अधूरे रह गए होंगे। दो दिन बाद इतवार आया। रात के साढ़े बारह बजे फ़ोन की घंटी बजी। चाचा अब नहीं थे। 

मेरे मन में वह अंतिम दृश्य बार बार कौंध जाता है, जब हम शादी के बाद दिल्ली के लिए लौट रहे थे और उन्होंने छोटी बहन को पूछा और उसे पास बुलाकर बिदाई के स्वरूप कुछ रुपये दिये होंगे। हम वहाँ से अभी चले भी नहीं हैं, कि वह चारपाई पर लेटे लेटे दूसरी तरफ़ मुँह फेर लेते हैं। शायद उन्हें आभास हो गया था, अब वह हम सबको अपनी बची ज़िंदगी में दोबारा कभी नहीं देख पाएंगे। उनका यह दुख इसी तरह व्यक्त कर सकता था। वह हमारी किन यादों में डूब गए होंगे, कह नहीं सकता। पर हमारे हिस्से के गाँव में चाचा एक ऐसे पात्र थे, जिनके न होने से वह जगह हमेशा के लिए खाली हो गयी, जो सिर्फ़ उनके होने से भरी हुई थी। हमारी कल्पना में वह चाचा का घर चाचा के न होने के बाद कैसे हो गया होगा, सोच भी नहीं पा रहा। चाचा क्यों हमारे इतने पास थे, इसकी कोई ठोस वजह नहीं है, जिसे अभी तक न कहा हो। 
  
(क्रमशः)

Wednesday, March 28, 2018

#48 # साप्ताहिक चयन: "टुकड़ा-टुकड़ा अनुभव ...." / पूनम अरोड़ा

पूनम अरोड़ा

नवोत्पल के इस अंक में  कहानी और  कविता को संगीत के साथ मिलाकर अपनी आवाज में एक नया स्वरूप देने वाली पूनम अरोड़ा जी की कविता का चयन किया गया है  आप ने इतिहास और मास कम्युनिकेशन मे परास्नातक की उपाधि हासिल की है । पूनम जी हिंदी और विश्व साहित्य के पठन में गहरी रूचि रखने वाली हैं तथा सिनेमा की बारीकियों को भी भलीभाँति समझती हैं , जिस का प्रभाव भी आप की लेखनी पर सहज ही दिखता है। अपनी दो कहानियों 'आदि संगीत' और 'एक नूर से सब जग उपजे'  के लिए आप को  हरियाणा साहित्य अकादमी का युवा लेखन पुरस्कार मिल चुका है। 2016 में लल्लनटॉप द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में आप की कहानी 'नवम्बर की नीली रातें' पुरस्कृत है और वाणी प्रकाशन से एक किताब रूप में प्रकाशित हुई है।



आज इस कविता पर  टिप्पणी लिखने के लिए अपनी सहज स्वीकृति श्री शिव किशोर तिवारी जी ने दी है। शिव किशोर जी भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं , पर सरकारी कामों मे सदैव उलझा रहने वाला ये मन, साहित्य की सूक्ष्मतम बारीकियों से भी बख़ूबी वाकिफ़आप की साहित्यिक दृष्टि और अध्ययन दुर्लभ है।  आप की लिखी हुई विवेचनात्मक समीक्षाएं पढ़ना एक गंभीर परंतु सुखद अनुभव होता है । आप ने बांग्ला , असमिया , सिलहटी और अङ्ग्रेज़ी के अनुवाद का कार्य किया है।
आइये आज कविता पढ़ते हैं पर टिप्पणी सिर्फ पढ़ेंगे नहीं बल्कि लिखना भी सीखते हैं 




....................................................................................................................

टुकड़ा-टुकड़ा अनुभव

By: Anjana Tandon

मेरे पास अदृश्य हवा को रोकने का कोई तरीका नहीं था
तो मैंने उसे कहा 
आओ
हवाओं
देखो मेरा पालना

और मेरे मुंडन के समय उतरे बाल वहीं एक कोने में रखे हैं
पान के पत्ते में बंधे

मैं अपना संवाद जारी रख पाती
इससे पहले ही 
हवा ने एक तेज़ झौंके से मेरी डरी हुई आत्मा ले ली

मेरे होंठों पर 
आखिरी संवाद की हल्की लहर अभी बनी ही थी
कि मोक्ष की निराशा ने 
मेरी काया के तपते हुए वक्ष हथेलियों में थाम लिए
मनगढ़ंत नृत्य की किसी पहेली में उलझे हुए
हवा के सुडौल हाथों में मेरे फ़ाख्ता से वक्ष

अब तुम्हें रोना होगा 
हवा ने मुझसे कहा.
और मेरे मुलायम बाल काट दिए
मैं हँस दी

मैंने सोचा आग से शायद बच जाऊं मैं
लेकिन उसमें भी तो तुम्हारी स्मृति थी
और मेरी हँसी भी

उस आग की लपटों में 
कितनी ऊँची तक चली जाती थी मेरी हँसी

मैं बेहिसाब और अर्थहीन कल्पनाओं के मोह में अपना ही तिरस्कार करती गई
क्योंकि जानती थी 
कि सच्ची कला एक मृत्यु है
प्रेम की उस कुँवारी आभा की तरह 
जिसे स्वप्न में भी छूना घृणित है

यह सब एक पागलपन की तरह है
और अँधेरा है कि अपनी उपस्थिति में 
ब्लैक होल बनता जा रहा है मेरे लिए

मैं इस अँधेरे में 
उमर खय्याम के मोहभंग को ओढ़ लेना चाहती हूँ
एक ग़ज़ल बन जाना चाहती हूँ 


[पूनम अरोड़ा]

***********************************************************************************************************

शिव किशोर तिवारी 

केंद्रीय कथ्य या समेकित भाव पूनम अरोरा की कविताओं में प्राय: क्षीण होता है। उसकी जगह कई अलग-अलग स्थितियाँ, टुकड़ा-टुकड़ा अनुभव और खंड-खंड विचार प्रकट होते हैं। इस तरह की कविता वस्तुत: जीवंत मानसिक और भावनात्मक प्रक्रियाओं के अधिक निकट है। पाठक को वह आस्वाद्य होगी यदि प्रत्येक स्थिति या भावखंड को अलग-अलग समझे और अन्विति की अपेक्षा को गौण बनाकर रखे।
प्रस्तुत कविता की शुरू की पंक्तियां किसी शारीरिक,भावनात्मक या बौद्धिक परिवर्तन से जुड़ी हैं -
‘मेरे पास अदृश्य हवा को रोकने का कोई तरीका नहीं था
तो मैंने उससे कहा
आओ
हवाओं
देखो मेरा पालना
और मेरे मुंडन के समय उतरे बाल वहीं एक कोने में रखे हैं
पान के पत्ते में बँधे

मैं अपना संवाद जारी रख पाती
इसके पहले ही
हवा ने एक तेज़ झोंके से मेरी डरी हुई आत्मा ले ली’

कवि का वांछित अर्थ कदाचित बहुवचन  ‘हवाओं से ही व्यक्त होता है। हवायें काव्य-सृजन के संवेग और किशोर वय (तथा उससे जुड़े शारीरिक परिवर्तनों और आवेगों) का रूपक बनती हैं।तात्पर्य यह है कि कवि अपने को इन आवेगों-संवेगों के लिए तैयार नहीं पाती। यहां पालना और मुंडन के बाल इस तैयारी के न होने की भावना के रूपक हैं, न कि वास्तविक बचपन के।

परंतु सृजन का संवेग आ ही जाता है और शंकितमना कवि की आत्मा पर अधिकार कर लेता है। इसी प्रकार का अर्थ किशोर वय के संदर्भ में भी ग्रहण करेंगे।

अगली छ: पंक्तियों में देह के बिंब हैं। मुक्ति की आशा नहीं है। स्त्री और कवि के रूप में जो नियति वाचक के हिस्से आई है वह अपरिहार्य है। इस अनुभव से उपजी हताशा कवि के दुश्चिंता से तप्त वक्ष अपने हाथों में थाम लेती है। इस बिंब का यह अर्थ हो सकता है कि हताशा ने कवि को पूरी तरह जकड़ लिया है। यह अर्थ भी संभव है कि हताशा से कवि के तप्त हृदय को एक प्रकार की ठंडक मिलती है। नियति को स्वीकारने से चित्त शांत होता है। दूसरा अर्थ ग्रहण करें तो इस बिंब में वक्रोक्ति (अलंकार नहीं) का चमत्कार है। दूसरे बिंब में स्पष्ट हो जाता है कि कवि ने वक्ष शब्द का प्रयोग बहुवचन में क्यों किया है। ‘फ़ाख़्ता-से वक्ष’ कलात्मक सृजन की बाह्य अभिव्यक्ति हैं। वे स्वयं के रचे किसी नृत्य में रत हैं।“हवा के सुडौल हाथों में वक्ष” विलक्षण बिंब है जो एक साथ सुडौल स्तनों, सृजन-शक्ति की कलात्मक अभिव्यक्ति, स्तनों और हृदय के बीच के रहस्यमय संबंध (अर्थात् हृदय के भावों का यौवन से संबंध) तथा पहले के बिंब का प्रतिपक्ष सब कुछ द्योतित करता है। कविता के इस अंश में वाचक की भाषा अधिक पटु है, इसलिए पहले भाग और इसके बीच एक कालखंड का अंतर कल्पित करना होगा। परंतु उसके बाद की ये पंक्तियां शुरू की पंक्तियों से अधिक मेल खाती हैं –

‘अब तुम्हें रोना होगा
हवा ने मुझसे कहा और मेरे मुलायम बाल काट दिये
मैं हंस दी’
लगता है जैसे हम पीछे चले गये हैं, कि ये पंक्तियां दस पंक्तियों के बाद आनी थीं न कि पंद्रह पंक्तियों के बाद। मैं इसके दो कारण सोच पा रहा हूँ – पहला यह कि यह कविता स्मृति के आधार पर लिखी गई है और स्मृतियाँ रैखिक नहीं होतीं और दूसरा यह कि जीवन के किसी चरण में बीते चरणों का एक अंश बचा रहता है।दूसरे शब्दों में,यादें किसी क्रम में नही आतीं, बेतरतीब आती हैं और जीवन का हर अध्याय पूर्व अध्यायों से कुछ लेता है। इन पंक्तियों में रोना स्त्री और कवि के जीवन की वास्तविकता का रूपक है। जीवन तो कठिन होगा ही, सहानुभूति के विस्तार के कारण कवि दूसरों के दु:खों को भी अनुभव करेगी। मुलायम बालों का काटना बचपन की निर्दोष सरलता के अंत का रूपक है। “हँस दी” अविश्वास का द्योतक है – ऐसा भी होता है कहीं?

वाचक की हँसी को अगले बिम्ब से जोड़ा है –
‘मैंने सोचा आग से शायद बच जाऊँ मैं
लेकिन उसमें भी तो तुम्हारी स्मृति थी
और मेरी हँसी भी
उस आग की लपटों में
कितनी ऊँची तक चली जाती थी मेरी हँसी’
आग कई क़िस्मों की है –दु:ख की, प्रेम की, वासना की- परंतु यहाँ कवि ने सबसे बड़ी आग प्रेम में असफलता को कल्पित किया है। वह जीवन के सारे संतापों का प्रतिनिधित्व करती है। वाचक कवि को एक भोली उम्मीद थी कि कम से कम इस ताप से बची रहेगी। पर ऐसा नहीं हुआ। आग उसकी आशा की हँसी को भी भस्म कर गई। बल्कि आशा की हँसी ने आग में घी का काम किया –“कितनी ऊँची तक चली जाती थी मेरी हँसी”। पर यह आग फिर भी प्रिय की स्मृति और अपनी हँसी का वास बनकर कवि वाचक के साथ रहेगी।
इसके बाद की छ: पंक्तियाँ स्वतंत्र कविता की तरह हैं। कवि को लगता है कि उसने अपने सृजनशील स्व को निरर्थक विकल्पों (प्रेम,सुख आदि) के फेर में नकारा है। इसका कारण वह यह कल्पित करती है कि अपनी सृजनशीलता में निमज्जित होना एक तरह की मृत्यु है (अत: कवि को उससे भय लगता है)। इस मृत्यु का उपमान यह है –

‘प्रेम की उस कुँवारी आभा की तरह
जिसे स्वप्न में भी छूना घृणित है’
एक अभौतिक तत्त्व की उपमा एक और अभौतिक तत्त्व से देना पाठक का काम आसान नहीं करता। परंतु अभिप्राय यह प्रतीत होता है : प्रथम प्रेम में शरीर-तत्त्व की अनुपस्थिति उसे सबसे सर्वाधिक पवित्र अनुभव बनाती है; वैसे ही कला में पार्थिव-शरीरी अनुभवों को उनकी शारीरिकता से मुक्त करना होता है।
अपनी वर्तमान स्थिति कवि वाचक को पागलपन और अँधेरे की तरह भ्रमयुक्त लगती है। अस्तित्व एक ब्लैकहोल बनता जा रहा है जिससे कोई किरण नहीं निकलती। कवि इस स्थिति की परिणति का अनुमान भी नहीं कर पाती, जैसे कोई ब्लैकहोल के रूप का अनुमान नहीं कर सकता। इस स्थिति में कवि की यही कामना है –

‘उमर खय्याम के मोहभंग को ओढ़ लेना चाहती हूँ
एक ग़ज़ल बन जाना चाहती हूँ’
कई विद्वानों ने उमर ख़य्याम की रुबाइयों को धर्म, ईश्वर, समाज आदि से उनके मोहभंग की उपज बताया है। कवि उसी मोहभंग की अवस्था को प्राप्त करना चाहती है और ख़ुद एक ग़ज़ल बन जाना चाहती है।ग़ज़ल बन जाने की इच्छा को इस कल्पना से जोड़कर देखिए कि कला मृत्यु की तरह है।

इस टिप्पणी का उद्देश्य कविता को पढ़ने में पाठक की मदद करना है। मैं एक व्याख्या प्रस्तावित करता हँ ओर उम्मीद करता हूँ वह पाठकों पर उद्दीपन (Stimulus) की तरह काम करेगी। कविता का साहित्यिक मूल्यांकन करना यहाँ अभिप्रेत नहीं है। फिर भी शिल्प के बारे में कुछ कहना ज़रूरी है। कविता में हवाओं को मैंने रूपक कहा है, परंतु कोई चाहे तो प्रतीक भी कह सकता है।रूपक और प्रतीक का अंतर बहुत बार स्पष्ट नहीं होता। इस कविता में भी इस तरह की अस्पष्टता है। इस अस्पष्टता के कारण कविता का आरंभ अनिश्चयपूर्ण (tentative) है। पहली दस पंक्तियों में यह कहना यह है कि वाचक को अपने अंदर होने वाले नाटकीय परिवर्तन का भान हो रहा है। उसे यह भी पता है कि यह परिवर्तन अपरिहार्य है। परंतु वह अपने को अप्रस्तुत पा रही है और उसके मन में संशय है।इस कठिन मन:स्थिति को “अदृश्य हवा” का रूपक या प्रतीक अपेक्षित नाटकीय रंग नहीं दे पाता, यद्यपि पालना व मुंडन वाले बाल शुद्ध रूपक हैं और सशक्त हैं। अनिश्चय भाषा में भी दिखाई पड़ता है –
1.       पहली पंक्ति में हवा और तीसरी पंक्ति में हवाओ।
2.       चौथी पंक्ति में ‘देखो’ के साथ मेल बैठाने के लिए “उतरे बाल वहीं एक कोने में” की जगह “ उतरे बाल जो वहीं एक कोने में” होना चाहिए था।

सौभाग्य से बीच में शिल्प पर पकड़ बेहतर हो जाती है। वक्षों के दो बिंबों में महीन तरीक़े से दो अलग-अलग मन:स्थितियों को व्यक्त किया गया है। ऊपर व्याख्या में उल्लेख हो चुका है। परंतु यहां भी “आख़िरी संवाद की हल्की लकीर” सुंदर होते हुए भी भ्रम पैदा करती है कि कविता का यह भाग कालक्रम की दृष्टि से पहले भाग के मिनटों बाद घटित होता है। यह संभव नहीं है। पालने को निकट महसूस करने वाली वय और अपने स्तनों की बात करने वाली वय में बरसों नहीं तो महीनों का अंतर चाहिए।
कविता के मध्य में आने वाले अन्य बिंब भी सशक्त हैं। “मुलायम बाल काट दिये” हृदयग्राही बिंब है। आग का बिंब मात्र तीन छोटी पंक्तियों में पूरी एक कथा कह जाता है।

आख़िरी पंक्ति पर मेरे मन में आया – ग़ज़ल क्यों,रुबाई क्यों नहीं?

[शिव किशोर तिवारी]

Thursday, March 15, 2018

#47 # साप्ताहिक चयन: "शाम का साथी ...." / सुधांशु फिरदौस


“ हमें कविताओं में सौम्यता को लाना होगा, जबकि प्रेम तो आवश्यक है ही। अपने आसपास देखिये, सबसे ज्यादा हमले किस पर होते है ? सौम्यता पर ही न, जैसे स्त्रियों, बच्चों और प्रकृति पर । इसीलिए मैं प्रकृति पर लिखता हूँ !" 

एक साक्षात्कार में ये कथन दिया था सुधांशु फिरदौस जी ने ।  
सुधांशु फिरदौस 

सुधांशु फिरदौस जी आज हिन्दी के युवा कवियों में शीर्ष के नामों में से एक हैं। हिंदी वालों के साथ ही साथ उर्दू अदब के आशिक भी आप की लेखनी पर फिदा हैं। BHU के विद्यार्थी रहे सुधांशु जी गणित के छात्र और अध्यापक हैं। पर जीवन के समीकरणों ने आप की रुचि कविता, साहित्य और कला की तरफ शुरुआत से ही मोड़ कर रखी हुई है।

आप की कविता ‘शाम का साथी’ पर टिप्पणी लिखने हेतु अपनी सहमति दी है युवा कवि एवं कुशाग्र आलोचक अविनाश मिश्र जी ने। अविनाश जी संप्रति एक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन भी कर रहे हैं।  

आइए देखते हैं कि इस अद्भुत युग्म ने आज नवोत्पल के लिए क्या नया स्वाद गढ़ा है।

 [ डॉ गौरव कबीर ]
______________________________________________________________

छाया: गौरव कबीर 

शाम का साथी

डूबते हुए सूरज के साथ
रक्ताभ होते आकाश का हल्का नीलापन
मुझे मेरे अंदर किन्हीं अतल गहराइयों में डुबो रहा है
लगभग सारे पक्षी अपने बसेरों की ओर उड़ चले हैं
नदी किनारे मछलियों से बात करने में मसरूफ
एक छुट गया अपने झुंड से


अपनी व्याकुलता और उदासी के साथ
आज की शाम मेरे साथ सिर्फ वही है



_______________________________________________

जब परिचय गैरजरूरी हो उठता है, हिंदी कविता में उस आयु और अस्मिता तक आ चुके सुधांशु फ़िरदौस की कविता ‘शाम का साथी’ को अगर इसके शीर्षक के बगैर कहीं प्रस्तुत या उद्धृत किया जाए, तब यह किसी लंबी कविता का एक अंश प्रतीत हो सकती है. लेकिन यों है नहीं, क्योंकि आठ पंक्तियों की यह एक मुकम्मल कविता है.

सुधांशु ने अपनी कविताओं की इधर जो दुनिया बनाई है, वह अछूते विषयों और ‘विडंबनाओं के विस्तृत’ से निर्मित हुई और हो रही है. लेकिन एक कवि की ‘रोज बनती दुनिया’ में कुछ तत्व और असर बहुत स्थायी होते हैं, वे तमाम बदलावों के बीच भी नहीं बदलते. इस अर्थ में देखें तो देख सकते हैं कि सुधांशु की कविताएं तब सबसे ज्यादा सुंदर नजर आती हैं, जब उनमें लोक और प्रकृति के बिंब आते हैं. यह सुखद है कि उनके अब तक के कविता-संसार में यह सुंदरता प्राय: घटित होती रही है.

इस घटित होते रहने में अपनी मूल काव्याभिव्यक्ति को पाने की कवियोचित छटपटाहट सुधांशु में देखी गई है. यह उनके लिए बतौर एक कवि अपने आस-पास को, उसकी गतिशीलता को समझते और व्यक्त करते हुए अपने अंदर किन्हीं अतल गहराइयों में डूबने की तरह रहा है, जिसका इशारा यहां उनकी एक प्रारंभिक कविता ‘शाम का साथी’ में नजर आता है.

इस कविता में अकेले होते चले जाने की प्रामाणिक प्रक्रिया और कारुणिक दृश्य — कविता में बस एक शाम भर का दिखाई देते हुए भी — कवि के अतीत और आगामी संघर्ष भरे सालों तक फैला हुआ नजर आता है. यह भविष्य को ‘आज की शाम’ में पढ़कर उसे अभिव्यक्त कर देना भी है— अपनी व्याकुलता और उदासी के साथ.

सुधांशु ने अपनी व्याकुलता और उदासी को कविता में कभी रद्द नहीं किया है. वह जीवन और संसार के कैसे भी प्रसंगों को कविता में कहें, यह ख्याल रखते हुए कहते रहे हैं कि उनकी व्याकुलता और उदासी कहीं उनसे छूट न जाए. यह ख्याल बहुत कुछ को छूटते हुए देखने और उसके बोध से पैदा होता है.

यहां प्रस्तुत कविता में सारे पक्षियों का अपने बसेरों की ओर उड़ चलना, सिर्फ पक्षियों का उड़ चलना नहीं है. यह घोर दुनियावी व्यस्तताओं की रफ्तार में एक कवि का अपनी संवेदना की वजह से अकेला पड़ जाना है.

इस अकेलेपन में सुधांशु फ़िरदौस का वास्ता इस सदी में सामने आई हिंदी कविता की उस पीढ़ी से है जो इन दिनों एक साथ अपनी उर्वरता और निर्लज्जता को जी रही है. कवि होने के दायित्व को जानने और वक्त में अपने किरदार की शिनाख्त करने के बजाय आज बहुत सारे कवि आईनों से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं. यह आत्मग्रस्तता आत्मप्रचार के संसाधनों के सहज हो जाने का निष्कर्ष है. यह पीढ़ी अपने वरिष्ठ कवियों को असुरक्षाबोध से आकुल, उनकी कविता को बहुत उपलब्ध और एक सार्वजनिक स्वीकार का मोहताज देख रही है. उनकी हरकतें नवांकुरों से भी गई-गुजरी हैं. इस स्थिति में सुधांशु ही नहीं किसी भी वास्तविक कवि का काम करना बहुत मुश्किल है, लेकिन इस दृश्य में उनका कवि हाथ का काम छोड़कर बैठ नहीं गया है. वह उसे बेहद सलीके और धैर्य से बता-सुना रहा है, जो उस पर बीता है.

सुधांशु प्रभावों से मुक्त एक मौलिक कवि-कर्म का प्रस्थान-बिंदु पार कर चुके हैं. उनके नजरिए में दूरगामिता की चाह ने उनकी कविता को समृद्धि दी है. जीवन में बहुत कुछ छूटने और ग्रामों से निकलकर नगरों-महानगरों में बसने और उनसे बराबर गुजरने के बावजूद भी उनके यहां ‘जनपद’ छूटा हुआ नहीं लगता है. उनमें एक साथ शब्द-संकोच और शब्द-बाहुल्य को पाया जा सकता है. कवि की यह विशेषता पूरी सामर्थ्य के साथ एक जनपद का समग्र दृश्य-विधान रच सकती है— कभी शब्द-संकोच के साथ, कभी शब्द-बाहुल्य के साथ.

सुधांशु ने अपने अब तक के काव्य-कौशल से जिस शब्द-शक्ति, बिंब-वैभव और अर्थ-बहुलता का प्रकटीकरण किया है, वह अपने कुल असर में उन्हें हिंदी कविता में उस आयु और अस्मिता तक ले आता है, जहां परिचय गैरजरूरी हो उठता है.